Sunday, June 7, 2020

डर या विश्वास

एक दिन वह और उसके चेले नाव पर चढ़ेऔर उस ने उन से कहाकि 

आओझील के पार चलें: सो उन्होंने नाव खोल दी (लूका 8:22)


प्रभु यीशु के अतुल्य नाम में आप सभी को जय मसीह की, मैं आपका भाई राजेश, दोस्तों हवा का काम है हिलाना
 और आंधी का काम है डराना और प्रभु का काम है बचाना...सवाल है हमारे जीवन को कौन सी ताकत चला रही है 
डर की या विश्वास की...यदि हम दुनिया की उन बातों की ओर अपना पूरा ध्यान रखेंगे जो डराती हैं और उन आं
धी 
और तूफान को ही देखते रहेंगे तो हमारे जीवन में प्रभु की उपस्थिति मौजूद होते हुए भी कभी नहीं देख 
पाएंगे...लेकिन इसके बदले यदि हम प्रभु को और उसकी उपस्थिति को अपने बीच में महसूस करेंगे तो डराने वाले

उस आंधी और तूफान को शांत होते देख सकेंगे...

ऐसा ही एक मंजर हम प्रभु के चेलों के साथ पाते हैं वो जब समुद्र अपने क्रोध के पूरे ऊफान में है चेले उस तूफान
 के बीच नाव में हैं, जिसमें प्रभु की उपस्थिति सशरीर मौजूद है...शायद आज समुद्र अपने उग्र रूप में है...जिसने 
समुद्री 
मछुआरों को भी भयभीत कर रखा है...सबकी निगाहें और धडकने उस तूफानी लहरों के साथ ऊंची ऊंची 
हिलकोरे ले 
रही हैं...मुंह से बरबस ही निकल रहा अब मरे की तब मरे...इन सब ड्रामे की बीच एक शक्स सो रहा है...हम 
मरे जाते हैं, और तू सो रहा है...


जीवन की इस यात्रा में कुछ साथ ले या न लें न हो कम से कम दो बातें तो जरुर पक्का कर लेना चाहिए पहला यह 

की हमारे लिए प्रभु यीशु कौन है, वो सृष्टिकर्ता  है या नहीं, वो बचाने वाला है या नहीं, वो जीवन और मृत्यु से 

बढ़कर है या नहीं, और दूसरी बात यदि वो उपरोक्त में सब कुछ है तो वो हमारे साथ है कि  नहीं हमारी नाव में है या 

नहीं...यदि ये दोनों बाते हाँ हैं तो डर किस बात का...क्या उसकी नांव से कोई आज तक डूब के मरा है...जब उसने 

पहले ही कह दिया आओ पार चले तो फिर में डूबने का सवाल ही नहीं उठता....प्रभु में आपका भाई राजेश....

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