परमेश्वर के साथ चलना,दण्ड से छुटकारा है

..."अब जो मसीह यीशु में हैं, उन पर दण्ड की आज्ञा नहीं..क्योंकि वे शरीर के अनुसार नहीं बल्कि आत्मा के अनुसार चलते है" (रोमियों 8:1)

     क्या ही सुंदर प्रतिज्ञा है अब जो मसीह में हैं उन पर दण्ड की आज्ञा नहीं...हम स्वभाव से ही पापी थे...सबने पाप किया और परमेश्वर की महिमा से रहित थे...हम सबके पापों की मजदूरी तो मृत्यु होनी थी...परन्तु परमेश्वर के अपार प्रेम से उसने हमसे प्रेम किया...हमें चुन लिया...और अपने एकलौते पुत्र के लहू से हमारे सारे पापों को धोकर हमें शुद्ध किया....इसलिए अब जो कोई मसीह यीशु में हैं वो एक नई सृष्टि हैं पुरानी बातें बीत गई...देखो सब कुछ नया हो गया है...

    अब हम पर दण्ड की आज्ञा नहीं...परमेश्वर के साथ-साथ चलने वालों के लिए खुशखबरी है कि उन पर दण्ड की आज्ञा नहीं...दुनिया के शाप...दुनिया की ताकतें...काले जादू - टोने की शैतानी शक्तियाँ...उन पर कोई असर नहीं कर सकती। यहाँ तक कि हम नरक की आग से भी बच सकते हैं....

हम बाइबल में पाते हैं, जब प्रभु यीशु को क्रूस पर कीलों से लटकाया गया...उस समय प्रभु के इर्द गिर्द दो चोर डाकुओं को भी मृत्यु दण्ड के लिए लटकाया गया...जिन्होंने जीवन भर केवल चोरी की थी हत्या की थी डाका डाला था...उनमें से एक चोर तो प्रभु यीशु ठठ्टा कर रहा था...निंदा करके कह रहा था यदि तू प्रभु है तो अपने आप को बचा ले और हमें भी बचा...लेकिन प्रभु के उस छोटे अद्भुत उपदेश के कारण दूसरा चोर ने पूर्ण समर्पण के साथ प्रभु से विनती की...प्रभु जब तेरा राज्य आए तो मेरी भी सुधि लेना...जीवन भर पाप करने और अधर्म में जीवन जीने के बावजूद उसकी एक दिल से की गई प्रार्थना और प्रभु में आने के कारण उसे प्रभु ने अनुग्रह के कारण एक महान प्रतिज्ञा दी...अब तेरे ऊपर दण्ड की आज्ञा नहीं...मैं तुझसे सच कहता हूँ ...आज ही तू मेरे साथ स्वर्गलोक में होगा...

      फर्क नहीं पड़ता की हमारे प्रभु के साथ चलने की उम्र या समय सीमा की लम्बाई कितनी रही है परन्तु मायने इस बात से है की उसमें समर्पण कितना है...इस चोर ने जो यीशु मसीह के साथ विश्वास में चलने की समय सीमा कुछ पल ही रही है और उस चोर के पीढ़ी दर पीढ़ी के पाप और शाप एक पल में ही टूट गया...और उसे स्वर्ग प्राप्त हुआ...आज प्रभु का वचन हमें भी उसके साथ आत्मा के अनुसार चलने का आह्वान करता है...एक निमन्त्रण एक बुलाहट देता है....

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