परमेश्वर के साथ चलना एक लक्ष्य प्रदान करता है

परमेश्वर के साथ चलना, एक लक्ष्य प्रदान करता है 

हे भाइयों, ...मैं केवल यह एक काम करता हूँ, कि जो बातें पीछे रह गई हैं उनको भूल कर, आगे की बातों की ओर बढ़ता हुआ, निशाने की ओर दौड़ा चला जाता हूँ, ताकि वह इनाम पाऊं जिसके लिए परमेश्वर ने मुझे मसीह यीशु में ऊपर बुलाया है'। (फिलिप्पियों 3:13-14)

परमेश्वर के साथ साथ चलना हमारे जीवन में एक लक्ष्य प्रदान करता है।  किसी ने कहा है, बिना लक्ष्य के जीवन, बिना पता लिखे लिफाफे के समान है, जो कभी कहीं पहुँच नहीं सकता । 

प्रभु यीशु मसीह के पास एक बड़ा लक्ष्य था... सारी मानव जाति को पाप से बचाने का लक्ष्य...उन्होंने कहा मैं खोए हों को ढूंढने और उनका उद्धार करने आया हूँ...पाप रूपी अन्धकार भरी दुनिया के लिए मैं जगत की ज्योति हूँ...उनके पास एक स्पष्ट लक्ष्य था...उनके अंदर अपने पिता परमेश्वर की इच्छा को पूरा करने की आग थी...उन्होने कहा मेरे पिता के घर की धुन मुझे खा जाएगी....मेरा भोजन मेरे भेजने वाले की इच्छा को पूरा करना है...और जो कोई भी उनसे मिलता...बातें करता वो भी उस ज्वलंत शील इच्छा से उस लक्ष्य से अछूता नहीं रहता था...

प्रभु यीशु का महान चेला पतरस भी जब हारा हुआ निराश होकर झील के किनारे प्रभु यीशु से मिला तो प्रभु ने उसके जीवन में एक चमत्कार किया और जिस स्थान में वो हार गया था, उसी स्थान में उसे नांव भर कर मछली देकर उसे विजयी किया...और यह कह कर कि मेरे पीछे हो ले मै तुझे मनुष्यों को पकड़ने वाला मछुआरा बनाऊंगा...पतरस की हैसियत से बढ़कर एक लक्ष्य दिया....

लुका रचित सुसमाचार 10:17-20 में एक घटना का वर्णन है। प्रभु यीशु मसीह ने 70 चेलों को जो उसके साथ साथ लगभग साड़े तीन वर्षों तक चले थे... नियुक्त किया और उनके लिए एक योजना बनाई कि दो-दो की जोड़ी में उन्हें उन स्थानों में जाना है जहाँ प्रभु यीशु स्वयं जाना चाहते थे। और उन्हें कौन सा सामान साथ नहीं ले जाना है और जाकर क्या-क्या करना है,  इस विषय में  स्पष्ट आदेश दिए। 9 वीं  आयत में लिखा है कि यीशु ने उनसे कहा वहां के बीमारों को चंगा करो और उनसे कहो कि परमेश्वर का राज्य तुम्हारे निकट आ पहुंचा है। उसके बाद उसने कहा कि जो तुम्हारी सुनता है, वह मेरी सुनता है। जो तुम्हें तुच्छ जानता है, वह मुझे तुच्छ जानता है। और जो मुझे तुच्छ जानता है वह मेरे भेजने वाले को तुच्छ जानता है। आज तक जिनके पास कोई लक्ष्य नहीं था उन्हें स्पष्ट और महान लक्ष्य मिल चूका था

  17 वीं आयत में लिखा है इस सबका परिणाम यह हुआ कि वे सत्तर आनन्द से वापस आकर कहने लगे कि हे प्रभु तेरे नाम से दुष्टआत्मा भी हमने निकालीं। वे हमारे वश में हैं। तब प्रभु यीशु ने उनसे कहा कि मैं शैतान को बिजली के जैसे स्वर्ग से गिरा देख रहा था। 

आज यदि हम उस पर विश्वास करते हैं तो प्रभु यीशु जो स्वयं जगत की ज्योति है हमें अपने संग बुला कर महान आदेश देते हुए कहता है...तुम जगत की ज्योंति हो...तुम धरा के नमक भी हो...जाओ और जाकर सारे जगत के लोगों को चेला बनाओ और उन्हें पिता, पुत्र और पवित्रात्मा के नाम पर बप्तिस्मा दो। और उन्हें वे सारी बातें मानना सिखाओ जो मैंने तुम्हें सिखाईं हैं...और देखो जगत के अंत तक मैं तुम्हारे साथ हूँ...हमारे पास एक बड़ा लक्ष्य है...आइये उसके साथ साथ चलते हूए इसे पूरा करें। 

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