घमंड. परमेश्वर के साथ चलने की सबसे बड़ी बाधा

मित्रों प्रभु यीशु में आप सभी को मेरा प्यार भरा नमस्कार,
हम कुछ सप्ताह से सीख रहे हैं कि कैसे हम परमेश्वर के साथ-साथ चल सकते हैं...पवित्रशास्त्र में हम अनेकों ऐसे उदाहरणों को पाते हैं जो परमेश्वर के साथ चले हैं...ऐसे गवाहों का बादल हमें घेरे हुए है...बहुत से प्रभु के लोग हुए जिन्होंने अपनी दौड़ दौड़ी...बहुतों की शुरुआत तो बहुत बढ़िया थी परन्तु मार्ग में वे बहुत सी बाधाओं के कारण अपनी दौड़ पूरी नहीं कर पाए....या यूँ कहें कि कुछ बाधाओं ने उन्हें परमेश्वर के साथ साथ चलने से रोक दिया...उन बाधाओं में से सबसे बड़ी बाधा जो परमेश्वर के साथ चलने से रोकती है वो बाधा है घंमड...सब मन के घमंडियों से परमेश्वर घृणा करता है...
     
      ऐसा ही एक उदाहरण हम पवित्रशास्त्र के 2 इतिहास की पुस्तक के 26 अध्याय में पाते हैं जहाँ उज्जियाह नामक राजा था जो मात्र 16 साल की उम्र में ही राजा बन गया और पांचवी आयत में हम पाते हैं वह परमेश्वर की खोज में लगा रहता था...जब तक वह परमेश्वर की खोज करने में लगा रहा तब तक परमेश्वर ने उसे सफलता दी (उसे भाग्यवान) बनाए रखा...यहाँ हम एक सबक को सीखते हैं कि परमेश्वर स्वयं चाहते हैं कि खोई उन्हें खोजे...उसके मार्ग के खोजी बने रहे....उसके साथ चले...उसकी आज्ञाओं का पालन करें....उसने तो वायदा ही किया है कि, तू पहले उसके धर्म और राज्य की खोज कर और देख बाकी सारी वस्तुएं या सफलता हमारे पीछे हो लेंगी....परमेश्वर अपने साथ साथ चलने वाले को सफल और भाग्यशाली भी बनाता...परमेश्वर के संग चलना अपने आप में एक सफलता और सौभाग्य है.....

लेकिन (2 इतिहास 26:16) में हम देखते हैं कि जब वह सामर्थी हो गया, तब उसका मन फूल उठा...अर्थात वह घमंड से भर गया...वह अहंकारी हो गया....और वह यहाँ तक बिगड़ गया कि उसने परमेश्वर के विरुद्ध विश्वासघात किया...परमेश्वर किसी गरीब भक्त के साथ साथ चल सकता है परन्तु किसी घमंडी धनी...या सामर्थी विश्वासघाती के साथ नहीं चल सकता। राजा उज्जियाह इतना घमंडी हो गया कि परमेश्वर के दासों के मना करने पर भी वह परमेश्वर के मंदिर में धूप जलाने के लिए घुस गया। इस पर परमेश्वर का क्रोध उस पर इस रीति से भड़का कि वह कोढ़ी हो गया...और परमेश्वर के मन्दिर से अर्थात प्रभु की उपस्थिति से उसे भागना पड़ा...

परमेश्वर उज्जियाह राजा के घमंड से इस कदर क्रोधित था कि जब तक वह मरा नहीं तब तक परमेश्वर की महिमा मन्दिर में प्रगट नहीं हुई...(यशायाह 6:1) में लिखा है जिस वर्ष उज्जियाह राजा मरा, मैंने प्रभु को बहुत ही ऊंचे सिंहासन पर विराजमान देखा.... 

मित्रों बहुत बार हमारे जीवन में भी किसी न किसी रूप में घमंड रूपी उज्जियाह राजा जीवित रहता है, जो किसी धन के रूप में या शरीर के रूप में या आदत के रूप में,  या ऊंचे पद के रूप में हो सकता है...जब तक हमारे जीवन में भी वो घमंड रूपी उज्जियाह राजा मरेगा नहीं हमारे जीवन में भी प्रभु ऊंचे सिंहासन में विराजमान नहीं हो सकता...प्रथम स्थान नहीं पा सकता...जिस दिन घमंड पूर्ण रूप से मर जाता है...परमेश्वर की पूर्ण महिमा हमारे जीवन में प्रगट हो जाति है...

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