Seven Things Pleases God सात बातें जो परमेश्वर को प्रसन्न करती हैं





पवित्रशास्त्र कहता है जानने का प्रयत्न करो कि परमेश्वर को क्या भाता है (इफिसियों 5:10) तो हम कैसे जाने की हमारे परमेश्वर को क्या भाता है या उसे क्या बातें प्रसन्न करती हैं.. पवित्रशास्त्र ही वो खिड़की है जिसमें हम परमेश्वर के दिल में झांक सकते हैं...आइये कुछ पदों से जाने हमारे सर्वशक्तिमान स्वर्गीय पिता परमेश्वर को क्या प्रसन्न करता है
  
1.            विश्वास


बिना विश्वास परमेश्वर को प्रसन्न करना अनहोना है। (इब्रानियों 11:6)

जो बातें परमेश्वर को प्रसन्न करती हैं उनमें सबसे पहले नम्बर में आती है वो है विश्वास, बिना विश्वास परमेश्वर को प्रसन्न करना असम्भव है। बाइबल की उत्पत्ति की पुस्तक में हम एक ऐसे पुरुष के विषय में पाते हैं जो विश्वास का पुरुष था जिसे स्वयं परमेश्वर ने अपना मित्र कह कर पुकारा। हाँ आपने सही पहचाना उसका नाम अब्राहम था...अब्राहम ने परमेश्वर पर इतना अधिक विश्वास किया की अपने पुत्र इसहाक को जो उसके अति बुजुर्ग अवस्था में परमेश्वर की आशीष से ही प्राप्त हुआ था उस प्रिय बालक को परमेश्वर की आज्ञा से बलिदान करने तक को तैयार हो गया...उसे इतना विश्वास था की यदि परमेश्वर ने इसे बलिदान करने को कहा है, तो वह इसे मरे हुओं में से भी फिर से जीवित भी कर देगा...और परमेश्वर ने प्रसन्न होकर उसे अपने बेटे को बलिदान करने से रोक लिया और उसे ‘विश्वासियों का पिता’ का ख़िताब दिया।

2.     प्रभु यीशु जैसा स्वभाव एवं चरित्र

परमेश्वर ने कहा देखो यह मेरा प्रिय पुत्र है, जिससे मै अत्यंत प्रसन्न हूँ (मत्ती 3:17)

परमेश्वर, हमारे अंदर यीशु का स्वभाव को देखना चाहते हैं... पवित्रशास्त्र हमें आदेश देता है कि हमारा स्वभाव यीशु के समान हो...यदि यीशु का स्वभाव हमारे अंदर है तो विपरीत परिस्थिति में भी परमेश्वर हमें अपने अनुग्रह से भरेगा....
उत्पती की पुस्तक में हम एक और उदाहरण युसुफ को पाते हैं जो प्रभु यीशु के जैसे स्वभाव का था उसके भाइयों ने ही उसे नफरत करके उसे मार डालना चाहा और उसके कपड़े उतारकर उसे व्यापारियों के हाथों बेच दिया...उस पर दूसरे देश में झूठे आरोप लगाए गए...उसे जेल जाना पड़ा, गुलामी सहना पड़ा लेकिन उसके अंदर यीशु के जैसे क्षमा का स्वभाव था...एक दिन परमेश्वर ने उसे उसका प्रतिफल के रूप में उसी मिश्र देश में प्रधान मंत्री बनाकर आशीषित किया...उस समय भी उसने अपने भाइयों या अपने सतानेवालों से बदला नहीं लिया बल्कि उन्हें माफ करके गले लगाया।

   3. धर्म के काम

क्योंकि यहोवा धर्मी है, वह धर्म ही के कामों से प्रसन्न रहता है। (भजन संहिता 11:7)

बाइबल ऐसे लोगों के उदाहरण से भरी हुई है जिन्होंने भले भले काम किया जिनमें से एक उदाहरण हम प्रेरितों के काम पुस्तक के 9 अध्याय में पाते हैं। याफा नामक नगर में प्रभु का दास पतरस सेवा कर रहा था वहां एक स्त्री थी जिसका नाम तबीता अर्थात दोरकास था। वह एक विश्वासी स्त्री थी, वह भले भले काम किया करती और दान भी दिया करती थी...परन्तु किसी बीमारी में उसकी मृत्यु हो गई परमेश्वर ने उसके धर्म के कामों का प्रतिफल के रूप में अपने दास पतरस को भेजकर उसे प्रार्थना के द्वारा जीवित करवा दिया और यह चर्चा पूरे नगर में फ़ैल गई और इस घटना को पवित्रात्मा ने बाइबल में लिखवाया। परमेश्वर को हमारे धर्म के कार्य प्रसन्न करते हैं...

  4. परमेश्वर का भय मानना

यहोवा (परमेश्वर) अपने डरवैयों ही से प्रसन्न होता है (भजन संहिता 147:11)

परमेश्वर को एक और बात प्रसन्न करती है, वो है उसका भय मानना या उसका आदर करना। जो मनुष्य परमेश्वर का भी मानता है परमेश्वर उसे बुद्धि से और अपने ज्ञान से भी भरता है...परमेश्वर का भय मानना बुद्धि का आरम्भ है। मनुष्य का भय मानना फंदा है....
     जब परमेश्वर अपने इसरायली लोगों को मिश्र देश के 400 वर्षों की गुलामी से बाहर निकाल कर ले जा रहा था और उन्हें एक कनान नामक देश देना चाहता था...जहाँ दूध और मधु की धाराएं बहती थीं...उस देश में प्रवेश करने से पहले कुछ लोगों को उस देश की जासूसी करने भेजा गया...जिनमें एक कालेब नामक व्यक्ति भी था...ज्यादातर जासूसों ने वहां के दानव जैसे बड़े बड़े मनुष्यों को देखकर डर और दहसत भरी खबर सुनाई...जिसके कारण सभी लाखों लोगों के अंदर डर समाँ गया....परन्तु तभी कालेब ने सबके सामने आकर निडरता से कहा....अरे परमेश्वर हमारे संग है...भय मत खाओ...वो लोग तो हमारी रोटी जैसे ठहरेंगे...मतलब हम उन्हें यूं ही रोटी जैसे खा जाएंगे....परमेश्वर ने इस बात से प्रसन्न होकर कहा... “कालेब से मैं प्रसन्न हूँ क्योंकि उसके अंदर कुछ और ही आत्मा है

 5.  ख़ुशी से देना

परमेश्वर हर्ष से देने वाले से प्रसन्न होता है (2 कुरिन्थियों 9:7)

जक्कई नामक एक व्यक्ति जिसे सभी पापी कहते थे...वो चुंगी लेता था...लोगों को टैक्स के नाम पर लूटता था ऐसे व्यक्ति के पास गए क्योंकि वह अंदर ही अंदर यीशु को देखना भी चाहता था ....यीशु मसीह स्वयं उसका नाम लेकर पुकारते हैं और उसके साथ संगती करने उसके घर भोजन करने जाते हैं....जैसे ही प्रभु यीशु के पावन पैर उसके घर पर पड़ते हैं उसका मन बदल जाता है वह पश्चाताप करने लगता है। सच्चा पश्चाताप...मारे ख़ुशी के वह कहता है प्रभु आज मैं अपना मन फिराता हूँ...मुझे क्षमा करो मैं अपनी आधी संपति कंगालों को बाँट दूंगा और यदि किसी गरीब कंगाल का पैसा लूटा है, उसे चार गुना वापस लौटा दूंगा....वह हर्ष से दे रहा था....प्रभु ने सबके सामने कहा आज इसके घर में उद्धार आया है यह अब्राहम का पुत्र बन गया।

   6.  उदारता

भलाई करना और उदारता करना न भूलो, क्योंकि परमेश्वर ऐसे बलिदानों से प्रसन्न होता है (इब्रानियों 13:16)

परमेश्वर ने हमारे जीवन में इतनी भलाई की है और उसके भलाई और उदारता का सबसे बड़ा उदाहरण स्वयं प्रभु यीशु हैं वो हमसे भी यही चाहते हैं की हम भलाई करने में तत्पर रहें...एक बार प्रभु यीशु लोगों को उपदेश दे रहे थे...लोग इतना लीन होकर सुन रहे थे कि कब उपदेश सुनते-सुनते सुबह से शाम हो गई किसी को पता नहीं चला उस समय प्रभु यीशु लोगों को शारीरिक भोजन भी देना चाहते थे...तो उनहोंने अपने चेलों से पूछा की इनके लिए भोजन का इंतजाम करो...चेले लोगों की संख्या देखकर आश्चर्य में पड़ गए और कहने लगे प्रभु इन्हें यूं ही जाने दे क्योंकि ये लोग तो केवल पुरुष ही 5000 के लगभग हैं इतनी बड़ी संख्या में हम कैसे खिला पाएंगे .....परन्तु प्रभु स्वंय जानते थे कि क्या करेंगे...जब सभी एक दुसरे का मुंह देखरहे थे उसी समय एक नन्हा बालक अपना टिफिन बौक्स लेकर आया जिसमें उसकी माँ ने 5 रोटी और दो मछली उसके लिए दी थी.....प्रभु यीशु ने उस बालक के उस उदारता को सराहा और उस भोजन को ऐसा आशीषित किया की सभी हजारों लोग खा कर संतुष्ट हुए और तो और 12 टोकरे भर कर बच भी गए....

  7.  पापी का मन फिराव

परमेश्वर कहते हैं, मेरे जीवन की सौगंध मैं दुष्ट के मरने से कभी भी प्रसन्न नहीं होता, परन्तु इससे की दुष्ट अपने मार्ग से फिरकर जीवित रहे।(यहेजकेल 33:11)

      एक पापी जब अपना मन फिराता है तो स्वर्ग में आनन्द मनाया जाता है....परमेश्वर किसी भी पापी के नाश होने से प्रसन्न नहीं होते बल्कि उस पापी के परिवर्तन से प्रसन्न होते हैं। ऐसा ही एक व्यक्ति था जो प्रभु के लोगों को सताया करता था...उसके पाप और क्रूरता अपने चरम पर थी... उसने बहुतों को मौत के घाट उतारा था...यहाँ तक की मसीही लोग उसके नाम से कांपते थे उसका नाम शाउल था। एक बार वह दमिश्क के मार्ग में प्रभु यीशु के लोगों को सताने ही जा रहा था...तभी प्रभु यीशु ने उसे पकड़ लिया और उसे स्वर्ग से आवाज दी उस आवाज में इतनी सामर्थ थी की वह घोड़े पर से गिर गया...उसने सुना शाउल शाउल तू मुझे क्यों सताता है....शाउल समझ चुका था कि वह यदि प्रभु के लोगों को सताता है तो इसका मतलब वह यीशु मसीह को सताता है और उसी दिन उसका जीवन बदल गया....वह परिवर्तित होकर एक महान संत पौलुस बन गया जिसने पवित्र शास्त्र में अनेकों पुस्तकों को लिखा और अनेकों कलीसियाओं का संस्थापक बना....


आइये इस वर्ष वो करने का प्रयत्न करें जो हमारे प्रभु परमेश्वर को भाता है



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