परमेश्वर के साथ चलना



 प्रभु यीशु मसीह में सभी को नमस्कार, 


परमेश्वर के साथ चलना 




कहानी :- एक बार की बात है एक व्यक्ति ने स्वप्न देखा जो हमेशा परमेश्वर के साथ चलता था...वो समुद्र के तट पर चला जा रहा था...उसने देखा की गीली रेत में उसके साथ साथ एक जोड़ी और पैरों के निशान बन रहे हैं...
वह बहुत खुश था, कि परमेश्वर भी उसके साथ साथ चल रहे हैं...लेकिन थोड़ी दूर चलने के बाद...कुछ कांटो भरी और पथरीली भूमि आई..अब उसे अपने नंगे पैरों से चलना कठिन लगने लगा...अब जब उसने नीचे देखा तो उसे एक ही जोड़ी पैरों के निशान दिखाई दिए...वो परमेश्वर को दोहाई देने लगा...शिकायत करने लगा...प्रभु जब सब कुछ अच्छा था तब आप मेरे साथ चल रहे थे...लेकिन अब जब कांटो भरी डगर है...तो आप मुझे छोड़ दिए?
 तब एक आवाज आई बेटे ध्यान से देख यह नीचे मेरे पाँव के निशान है। जब सब कुछ अच्छा था तब मैं तेरे साथ चला.. लेकिन अब मैं तुझे उठा कर चल रहा हूँ ये मेरे पाँव के निशान हैं ....मैं तुझे अपने हाथों में उठाए हुए हूँ

बिलकुल इसी तरह जब हम परमेश्वर के साथ चलते हैं तो वह हमें सम्हालते हैं...लेकर चलते हैं...सुरक्षा देते हैं...

मित्रों आज हम इस विषय पर मनन करेंगे, परमेश्वर के साथ चलना...
परन्तु सवाल है..."क्या कोई इतना बुद्धिमान या सामर्थी है कि वह परमेश्वर के साथ चल सके?" क्या यह एक मनुष्य के लिए सम्भव है कि वह परमेश्वर के साथ चल सके? उत्तर है नहीं...कोई भी अपनी बुद्धि और बल के अनुसार परमेश्वर के साथ नहीं चल सकता...

लेकिन हम  पवित्रशास्त्र-बाइबल में पाते हैं... परमेश्वर स्वयं लोगों को बुलाते हैं कि वे परमेश्वर के साथ-साथ चलें। हम देखते हैं उत्पत्ति 17:1 में पमरेश्वर अब्राहम से जो प्रभु का एक दास था...उसे बुलाते हैं और कहते हैं, "मैं सर्वशक्तिमान परमेश्वर हूँ, मेरी उपस्थिति में चल"

कैसे कोई किसी के साथ-साथ चल सकता है ???  

मनुष्य एक मनुष्य के साथ केवल तब ही चल सकता है, जब वे दोनों के विचार एक दूसरे से मिलते हों...दोनों की मंजिल एक हो...
यहाँ बाइबल में परमेश्वर हम मानव को बुलाते हैं कि हम उसके साथ चलें...

परमेश्वर कहते हैं यदि हम परमेश्वर के साथ चलें तो हम सिद्ध हो जाएंगे...और परमेश्वर की आशीषों को भी पाएंगे। वह हमारी गलतियों को और अपराधों को क्षमा करके हमें अपने साथ चलने के लिए बुलाते हैं

(1 इतिहास 11:9) में लिखा है दाउद की मान प्रतिष्ठा..सम्मान बढती गई.. तरक्की पर तरक्की होती गई..क्यों, क्योंकि आगे लिखा है परमेश्वर उसके साथ था 

परमेश्वर के साथ चलना हमें तरक्की और मान प्रतिष्ठा भी प्रदान करता है...उसके साथ चलने के लिए हमें प्रतिदिन उसकी बातों को प्रथम स्थान देना होगा...हर बातों में उससे सलाह लेना होगा...यदि हम अपनी बुद्धि का सहारा न ले और सम्पूर्ण मन से उस पर भरोसा करें तो वह हमारे लिए सीधा सरल मार्ग निकालता है...


to be continue...


परमेश्वर के साथ चलने वालों के क्या चिन्ह होते हैं???

(अमोस 3:3) में आमोस नबी ने कहा, "यदि दो मनुष्य परस्पर सहमत न हों (एक मन न हों) तो क्या वे एक संग चल सकेंगे? 

परमेश्वर के साथ चलने वाला व्यक्ति अवश्य है कि वह परमेश्वर के साथ एक मन हो जाता है...परमेश्वर के साथ एक मन होना मतलब वह परमेश्वर के जैसा सोचता है...परमेश्वर के जैसे बोलता है...परमेश्वर के जैसे ही व्यवहार करता है...जिस बात से परमेश्वर को दुःख होता है उसे भी दुःख होगा...जिस बात से परमेश्वर को ख़ुशी मिलती है उस व्यक्ति को भी ख़ुशी मिलेगी।  

मत्ती 26:73 थोड़ी देर बाद लोगों ने जो वहां खड़े थे, पतरस के पास आकर उससे कहा, "सचमुच तू भी उनमें से एक है, क्योंकि तेरी बोली तेरा भेद खोल देती है। 

1. तेरी बोली तेरा भेद खोल देती है...

हमारी बोली, बोलने का ढंग, बात करने के तरीके, से बहुत कुछ पता चलता है...बुद्धिमान और मुर्ख तब तक नहीं पता चलता जब तक वे बोलते नहीं...जैसे ही वे मुह खोलते हैं कुछ बोलते हैं सभी को पता चल जाता है कि वे मुर्ख हैं या बुद्धिमान...

पतरस एक हारा हुआ असफल मछुआरा था जब उसकी मुलाकात प्रभु यीशु से हुई थी...लेकिन प्रभु यीशु ने उसकी नांव में बैठकर उसे आश्चर्यचकित रूप से उसके असफल स्थान में ही उसे सफलता दी...प्रभु यीशु के आदेश का पालन करने के कारण ही पतरस को एक दिन में ही इतनी मछली मिली की उसकी नांव डूबने लगी...तब से पतरस ने जो एक अनपढ़ और साधारण मछुआरा था...यीशु के पीछे चलने लगा...और साड़े तीन वर्ष तक यीशु मसीह के साथ चला...प्रभु यीशु के साथ भोजन किया ...और प्रभु यीशु के जैसे ही बातें करने लगा...
यही कारण है कि उसकी बोली भी बदल गई...बात करने का ढंग..तरीका...बदल गया...बात में आदर आ गया....इसी कारण जब प्रभु यीशु को रोमन सैनिकों ने पकड़कर कैद कर लिया...और पतरस बाहर भीड़ में खड़ा था तो लोगों ने उससे पूछा...तेरी बोली से पता चलता है कि तू उनमें से एक है....
सवाल यह है ..क्या हमारी बोली से पता चलता है कि हम प्रभु परमेश्वर के साथ चल रहे हैं...यदि नहीं तो आज ही हम अपने बोलने के तरीके को जांचे और देखें की हमारा प्रभु यीशु कैसे बोलते हैं...वे अपने शत्रुओं के लिए भी प्रार्थना करते हैं...वे हमेशा अपने शत्रुओं के लिए आशीष मांगते हैं...

2. (प्रेरितों के काम 4:13) जब उन्होंने पतरस और यहुन्ना का साहस देखा, और यह जाना कि वे अनपढ़ और साधारण मनुष्य है, तो आश्चर्य किया; फिर उनको पहचाना कि ये यीशु के साथ रहे हैं

प्रभु यीशु परमेश्वर के साथ चलने, साथ रहने के कारण पतरस और यूहन्ना जैसे साधारण और अनपढ़ लोगों के अंदर अद्भुत साहस आ गया...कि वे  लोग प्रभु के नाम से बड़े बड़े चिन्ह और चमत्कार भी करने लगे...
परमेश्वर के साथ साथ चलना हमें साहस प्रदान करता है...उसने कहा है की हमें डर का आत्मा नहीं मिला...डर हमें लकवाग्रस्त कर देता हैं, असफल बना देता है...परन्तु परमेश्वर के साथ चलना हमें साहस प्रदान करता है...
मसीही इतिहास में प्रारंभ से ही सताव होते रहे हैं...एक के बाद एक ऐसी बहुत से दल या बल खड़े हुए जिन्होंने मसीही सेवा को या प्रभु यीशु की शिक्षा के विरुद्ध खड़े होना चाहा...और दावा किया की मसीहत को मिटा देंगे परन्तु यह परमेश्वर के संग चलने का प्रतिफल है कि परमेश्वर ने अपने लोगों को साहस दिया...जिसके कारण प्रभु के लोग आज तक पूरे साहस के साथ खड़े हुए हैं....सियासतें आई और चली गईं परन्तु प्रभु का राज्य पूरे साहस के साथ बढ़ रहा था और बढ़ता रहेगा...उसकी प्रभुता सदा बढती रहेगी और उसकी शांति का कभी अंत न होगा....


परमेश्वर के साथ चलने का रहस्य
मनुष्य से बढ़कर स्वयं परमेश्वर की तीव्र इच्छा है की वह मनुष्य के साथ साथ चले... ऐसा प्रतीत होता है, परमेश्वर आरंभ से ही ऐसे स्त्री-पुरुष को खोज रहा था । प्रारंभिक स्त्री पुरुष आदम और हौआ की सृष्टि के बाद परमेश्वर प्रतिदिन दिन के ठन्डे शीतल समय में शायद सुबह और शाम उनके पास आता था, की उनके साथ एक पिता पुत्र/पुत्री का सम्बन्ध बना सके उनके साथ चल सके...
परन्तु मनुष्य ही है जो परमेश्वर की संगति से भागता रहा है...अपने पापमय स्वभाव के कारण दूर होता रहा है ।  
परन्तु बाइबल में विश्वास के ऐसे बहुत से नायक हुए जो परमेश्वर के साथ साथ चलते थे...जिनमें से विश्वास के तीन ऐसे महानायक हुए जो जीवित ही परमेश्वर के द्वारा स्वर्ग में उठा लिए गए ।
पहला हनोक जो धरती में 365 वर्षों तक जीवित रहा और परमेश्वर के साथ चलता रहा
इब्रानियों 11:5-6  विश्वास से ही हनोक उठा लिया गया कि मृत्यु को न देखे, और उसका पता नहीं मिला क्योंकि परमेश्वर ने उसे उठा लिया था, और उसके उठाए जाने से पहले उसकी यह गवाही दी गई थी कि उसने परमेश्वर को प्रसन्न किया है ।

दूसरा व्यक्ति एलिय्याह (2 राजा 2:11) वे चलते चलते बातें कर रहे थे, कि अचानक एक अग्निमय रथ और अग्निमय घोड़ों ने उनको अलग-अलग किया, और एलिय्याह बवंडर में होकर स्वर्ग पर चढ़ गया ।

तीसरा स्वयं प्रभु यीशु जो जीवित ही स्वर्ग में उठा लिए गए...
इन तीनों में जो बातें समान थी वो उनका विश्वास और आज्ञाकारिता थी...

विश्वास और आज्ञाकारिता ही वह रहस्य है जिसके द्वारा हम परमेश्वर को खुश कर सकते हैं...परमेश्वर के साथ साथ चलना की सबसे पहली शर्त विश्वास और आज्ञाकारिता ही है जिसके बिना कोई भी परमेश्वर को प्रसन्न नहीं कर सकता ।

हाँ, हो सकता है कि हमारा विश्वास बहुत बड़ा न हो...लेकिन यह विश्वास भी तो परमेश्वर ही अपने परिमाण के अनुसार हमें देते हैं... (क्योंकि परमेश्वर यहोवा कहता है, मेरे विचार और तुम्हारे विचार एक समान नहीं हैं, न तुम्हारी गति और मेरी गति एक सी है ।)
जिस प्रकार एक पिता अपने उस बेटे को जो अभी अभी चलना सीखा है छोड़कर आगे नहीं बढ़ जाता बल्कि अपने बेटे की गति के अनुसार धीमे धीमे चलता है.. उसी प्रकार परमेश्वर भी अपनी गति को धीमा कर हमारे साथ चलता है...वो चालीस वर्षों तक इस्राइली लोगों के साथ आग का खंबा और बादल के रूप में उनके साथ साथ चलता रहा...
प्रभु यीशु ने भी अपनी कलीसिया को आदेश दिया है विश्वास और आज्ञाकारिता में बनी रहेगी तो वो जल्दी वापस आएँगे और अपनी कलीसिया को जीवित ही स्वर्ग ले जाएंगे जिसके लिए वो स्वर्ग में जगह तैयार कर रहे हैं । 








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