कछुआ और खरगोश- एक कहानी - आठ सीख

 

कछुए और खरगोश की कहानी हम सब बचपन से सुनते आ रहे हैं। लेकिन आज हम इस कहानी से आठ सीख सीखेंगे...

कछुए और खरगोश में रेस हुई। खरगोश ने सोचा की वह तो सुस्त कछुआ है यह मेरे संग क्या दौड़ेगा। खरगोश ओवर कांफिडेंस में आ गया और कुछ दूर दौड़कर सो गया और कछुआ धीरे-धीरे चलते-चलते मंजिल पर पहुँच गया, यह है पुरानी कहानी। 

कहानी की पहली सीख :- जीतता वही है जो लगातार पूर्ण समर्पण से कार्य करता है, ठीक उस कछुए की तरह


आप ऐसे कई सहपाठियों या अन्य लोगों को जानते होंगे जिनके बारे में आपने कभी सोचा भी नहीं होगा कि वे तरक्की करेंगे लेकिन आज वे समृद्धि के शिखर पर है। 
उसके विपरीत कुछ ऐसे लोग भी होंगे जिनकी सफलता आप तय मानते थे परन्तु वे आम जीवन जी रहे हैं

खरगोश की कौम कई वर्षों से शर्मिंदा थी, वे मुंह उठा कर चल नहीं पाते थे। छुपकर जंगलों में रहते थे ताकि कोई उनका मजाक न उड़ा दे। एक दिन खरगोशों ने अपमान का बदला लेने का निश्चय किया। खरगोशों ने कछुए को ललकारा, परन्तु अब कछुए ने दौड़ने से इंकार कर दिया क्योंकि कछुआ चतुर था, दूर की सोच रहा था। 

कहानी की दूसरी सीख :- एक बार शक्तिशाली शत्रु हार जाए तो भी अभिमान मत करना क्योंकि किस्मत हर बार मेहरबान नहीं होती और शत्रु हर बार त्रुटी नहीं करेगा 

खरगोश कौम ने भारी जुगाड़ लगाया, कोर्ट केस किया, हड़ताले की, जनसमर्थन जुटाया और कछुए को मजबूर कर दिया फिर से दौड़ने के लिए। 

बुध्दिमान कछुए ने शर्त रखी कि इस बार दौड़ का मार्ग मैं तय करूँगा। खरगोश तैयार हो गया। नियत समय पर दौड़ शुरू हो गई। खरगोश ने सोचा कि मार्ग तय करने से क्या होगा, आखिर काम तो गति ही आएगी। बड़े बेमन से कछुआ दौड़ने को तैयार हुआ परन्तु कछुए ने जबरदस्त दिमाग दिखाते हुए रेश का रास्ता ऐसा बनाया कि उसके बीच में एक पानी का नाला पड़ता था। 

कहानी की तीसरी सीख :- जब कोई काम करना तय हो जाए तो अपनी खूबियों को ध्यान में रखते हुए रणनीती बनाओ। 

खरगोश ने इस बार शपथ ली थी कि चाहे जो हो जाए, रास्ते में नहीं रुकूँगा। खरगोश तेजी से दौड़ा। दौड़ते-दौड़ते, अचानक खरगोश हक्का बक्का रह गया जब उसके सामने पानी भरा नाला देखा। उसने स्वप्न में भी नहीं सोचा था कि कछुआ इतनी बुद्धिमानी भरी चाल चल सकता है। फिर से हार और अपमान की कल्पना करके खरगोश अंदर से हिल गया। निराश, हताश और सुन्न खरगोश के मुंह से शब्द निकलने बंद हो गए। 

कहानी की चौथी सीख:- कभी भी दुश्मन या लक्ष्य को कमजोर या मुर्ख मत समझो। यदि आप चाल चल सकते हो तो वह भी चल सकता है। 

खरगोश हक्का-बक्का होकर नाले के किनारे बैठ गया क्योंकि उसे तैरना नहीं आता था। इतने में कछुआ वहां पहुंचा और खरगोश को देखकर मुस्कुराया। खरगोश की शर्मिंदगी से झुकी हुई पलके हार स्वीकार कर चुकी थीं। 

    इतने में दोनों को चौंकाते हुए शेर वहां आ पहुंचा। उसे कुछ भी माजरा मालुम नहीं था। उसने तुरंत कछुए और खरगोश से कहा कि, तुम दोनों मेरे साथ दौड़ लगाओ नहीं तो मैं तुम्हें खा जाऊँगा। एक छोटी सी दौड़ के कारण तुम्हारी कहानियाँ हर मंच पर बोली जाती हैं, और पुस्तकों में छापी जाती हैं। अब इस कहानी में मैं भी आना चाहता हूँ। 

कछुए और खरगोश ने निर्णय लिया कि,  बिना दौड़े मरने से अच्छा है, दौड़कर जीतने का प्रयास करना।  

कहानी की पांचवी सीख :- जब मुश्किल सामने हो तो हौसला हार कर समर्पण करने से अच्छा है, आखरी दम तक संघर्ष करना। कौन जाने कब स्थिति पलट जाए

खरगोश और कछुए ने कहा:- महाराज, हम तो छोटे हैं, आपके सामने हमारी कोई हैसियत नहीं है इसलिए दौड़ का मार्ग हमें चुनने दें। शेर ने दहाड़ते हुए कहा ठीक है

पुन: दौड़ पुरानी जगह से शुरू हुई। नाले तक कछुआ खरगोश की पीठ पर बैठ कर तेजी से आया। नाले पर खरगोश कछुए की पीठ पर बैठ गया। खरगोश को लेकर कछुआ चुपचाप तैरता हुआ निकल गया और शेर किनारे पर अपनी हार पर आग बबूला होता रहा। क्योंकि शेर इतना शक्तिशाली होते हुए भी तैरने की योग्यता नहीं रखता। 

कहानी की छटवीं सीख :- कोई बड़ा या तेज है इसका अर्थ यह नहीं कि वही जीतेगा।


कहानी की सातवीं सीख :- जब शत्रु शक्तिशाली हो तो टीम बनाकर मुकाबला करो।

कहानी की आठवीं सीख :- यदि आपकी कमी दूसरे की खूबी हो और दूसरे की कमी आपकी खूबी हो तो इससे अच्छी जोड़ी और नहीं हो सकती

इन जबरदस्त सूत्रों को आप अपनी जिन्दगी में उतार कर अपनी सफलता का प्रतिशत बढ़ा सकते हैं और अपने लक्ष्यों को पा सकते हैं

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2 comments:

  1. Very nice.. Hamne is kahani ko bahot bar padha but aaj tak in points ko kabhi nahi samajh paye.... Awesome

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  2. धन्यवाद पढने और कमेन्ट करने के लिए भाई जी

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