पहचान का संकट (story)



  
(यूहन्ना 1:12)
जितनों ने उसे (प्रभु यीशु को) ग्रहण किया, उस ने उन्हें परमेश्वर की सन्तान होने का अधिकार दिया, अर्थात उन्हें जो उसके नाम पर विश्वास करते हैं 



  • एक जंगल के पहाड़ी में एक शेर का परिवार रहता था...शेर-शेरनी और उनका नवजात शिशु (शावक)।


  • एक दिन शेर और शेरनी शिकार करने के लिए घने जंगल गए हुए थे...तभी उनका बच्चा जो अभी कुछ ही दिनों का था...भूख के कारण कुछ खोजने अपनी गुफा से बाहर आया और पहाड़ी से फिसल कर गिर गया। 

  • शेर का बच्चा लुड़कते हुए पहाड़ी के नीचे रहने वाले कुत्तों के बच्चो के झुण्ड में जा मिला...उसने देखा की कुत्ते के बच्चे अपनी माँ का दूध पी रहे हैं....इसलिए वो शेर का बच्चा भी जाकर उन्हीं कुत्ते के बच्चों के साथ दूध पीने लगा।

  •  कुछ दिनों में उन कुत्ते के बच्चों ने और कुत्ते ने उस शेर को भी अपने परिवार का सदस्य मान लिया...उस शेर ने भी उनकी बोली सीख लिया और उन्हें ही अपना भाई बहन समझ कर परिवार का सदस्य बन गया...

  •  अब जहाँ जहाँ यह कुत्ते का परिवार जाता यह शेर का बच्चा भी पीछे पीछे जाता...जो कुछ वो कुत्ते खाते अच्छा न लगने पर भी यह शेर का बच्चा खाने लगा...और जब सब कुत्ते भोंकते तो यह भी भोंकता ..

  • इसी तरह समय बीतता गया और वह शेर जवान हो गया लेकिन उसकी आदतें कुत्ते के जैसे ही थीं।  

  • एक दिन जब यह कुत्तों का झुण्ड खाना ढूंढने के लिए यहाँ वहां भटकते हुए घने जंगल में पहुँच गया ...तभी उन्हें वहां एक बब्बर शेर की दहाड़ सुनाई दी....शेर की दहाड़ सुनकर उन कुत्तों के झुण्ड में भगदड़ मच गई...

  • सभी अपनी जान बचाने के लिए भागने लगे...कुछ कुत्ते झाड़ियों में छिप गए कुछ चट्टान के पीछे...सभी को भागता देख यह शेर का बच्चा जो अब जवान शेर बन चुका था...वो भी भागकर एक पेड़ के पीछे छुप गया। 

  •  लेकिन बब्बर शेर ने कुत्तों के झुण्ड के साथ भागते शेर को देख लिया था...उसे बड़ा आश्चर्य हुआ...और वह धीरे धीरे उस पेड़ के पीछे छिपे हुए शेर का पास गया। वह शेर इस बब्बर शेर को देखकर डर के मारे कांपने लगा और भोंकने लगा...

  •  यह देखकर उस बब्बर शेर ने उससे कहा...तू क्यों डर रहा है...और छिप रहा है...अरे तू भी तो शेर है...और तू भोंक क्यों रहा है...तुझे तो दहाड़ना चाहिए...

  •  डरते हुए शेर ने कहा नहीं नहीं मैं शेर नहीं...कुत्ता हूँ।  

  •  बब्बर शेर ने उस शेर को तालाब के किनारे ले जाकर उसे अपना चेहरा पानी में देखने को कहा...जब शेर ने अपना चेहरा देखा, तो उसे ज्ञात हुआ अरे मैं तो शेर के जैसे दिखता हूँ...अब वह अपने वजूद को पहचान चुका था...कुछ समय तक वह अपने लोगों के साथ अर्थात शेरों के साथ रहकर दहाड़ना सीख लिया और शेर के जैसे जंगल में राजा बनकर शासन करना भी सीख लिया...

  •  प्रभु यीशु का दूसरा नाम, 'यहूदा गोत्र का सिंह' भी है और जितनों ने उसे ग्रहण किया है उसने उन्हें अपनी सन्तान होने का अधिकार दिया है...जो कोई मसीह में है वो नई सृष्टि है देखो पुरानी बातें बीत गई सब कुछ नया हो गया है...

  • मित्रों हमें जानने की जरूरत है कि हमारी संगती कैसी है...हम क्या सीख रहे हैं...कैसी बातें करतें हैं...हमारी संगती ही यह दिखाती है कि हम क्या बनेंगे या कहाँ पहुचेंगे। 


 मसीह में हमारी पहचान  

(इफिसियों 1:5) 
और अपनी इच्छा की सुमति के अनुसार हमें अपने लिए पहिले से ठहराया, की यीशु मसीह के द्वारा हम उसके लेपालक पुत्र हों


(1 कुरिन्थियों 6:17)
और जो प्रभु की संगती में रहता है, वह उसके साथ एक आत्मा हो जाता है


(उत्पत्ति 1:27)
परमेश्वर ने मनुष्य को अपने स्वरूप के अनुसार उत्पन्न किया, अपने ही स्वरूप के अनुसार परमेश्वर ने उसको उत्पन्न किया, नर और नारी करके उसने मनुष्यों की सृष्टि की

(यिर्मयाह 1:5)
गर्भ में रचने से पहिले ही मैं ने तुझ पर चित्त लगाया, और उत्पन्न होने से पहिले ही मैं ने तुझे अभिषेक किया; मैंने तुझे जातियों का भविष्यवक्ता ठहराया

(1 पतरस 2:9) 
तुम एक चुना हुआ वंश, और राज-पदधारी याजकों का समाज, और पवित्र लोग, और (परमेश्वर की) निज प्रजा हो, इसलिए कि जिस ने तुम्हें अंधकार में से अपनी अद्भुत ज्योंति में बुलाया है, उसके गुण प्रगट करो





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