Tuesday, January 22, 2019

यीशु मसीह कौन है ?? (भाग 1)




प्रभु यीशु मसीह ने कभी कोई किताब नहीं लिखी लेकिन उनके विषय में या उनके जीवनी के बारे में  पूरी दुनिया में सबसे ज्यादा पुस्तक छापी गई हैं। उनके जीवन के कुछ महत्वपूर्ण घटनाएं व तथ्य दिए गए हैं। 





  • यीशु का नामकरण स्वर्ग में हुआ...क्योकि स्वर्गदूत ने आकर मरियम और युसुफ को बताया कि उसका नाम यीशु रखना। जिसका मतलब है 'परमेश्वर उद्धार करता है...बचाता है" 

  • यीशु को अंग्रेजी में जीसस कहा जाता है जो मूल भाषा यूनानी से लिया गया है...यूनानी भाषा में 'इसुस' है...इब्रानी भाषा में येशुआ है जिसका अर्थ है, 'यहोवा उद्धार करता है'।

  • यीशु मसीह में 'मसीह' कोई नाम नहीं बल्कि एक पदवी है जिसका मतलब है 'अभिषिक्त' या अभिषेक पाया हुआ।

  • यीशु का जन्म मरियम नाम की एक कुंआरी कन्या के द्वारा हुआ...मरियम की मंगनी हुई थी शादी नहीं..यह पवित्रआत्मा की आशीष से हुआ।  

  • यीशु का जन्म की  भविष्यवाणी पुराने नियम के लगभग सभी भविष्यवक्ताओं ने की थी और जो कुछ उनहोंने यीशु के विषय में कहा था वो सब अक्षरशः पूरा हुआ। 

  • यीशु मसीह के  जन्म के विषय में लिखा है मरियम ने अपने पहले पुत्र को जन्म दिया और उसे चरनी में रखा क्योंकि सराय में उनके लिए जगह नहीं थी...(लूका 2:7) 

  • यीशु मसीह के जन्म दिन की खबर स्वयं स्वर्गदूत ने चरवाहों को दी थी। और पूरा विवरण भी दिया की बालक चरनी में  कपड़े से लिपटा हुआ पाओगे (लूका 2:8-13)

  • यीशु एक गरीब घर में पैदा हुए थे...क्योंकि जन्म के आठवे दिन जब उनको लेकर मन्दिर ले जाया गया तब फक्ता के (कबूतर जैसे ) जोड़े को चढाया गया..जो केवल सबसे निर्धन लोग ही चढाते थे। 

  • यीशु मसीह के जन्म के समय एक तारा दिखाई दिया जिसका पीछा करके मजूसी लोग (विद्वान लोग ) पूर्व देश से आये लोगों का मानना है वे तीन थे क्योंकि उनहोंने तीन भेंट दी थी....वे चरनी के पास गौसाले में नहीं आए थे बल्कि घर में आए थे जहाँ यीशु बालक थे अर्थात चल सकते थे। वे शिशु नहीं थे और उन विद्वान लोगों ने यीशु को दंडवत किया...यीशु की अराधना की। शायद इसी कारण हेरोदेश राजा ने दो ढाई वर्ष के बच्चों को मरवाया था। (मत्ती 2:11-12)

  • यीशु मसीह बचपन से ही बड़े विद्वान् थे क्योंकि उन्होंने 12 वर्ष की उम्र में ही बड़े बड़े फरीसियों को जो उस समय विद्वान् कहलाते थे अपनी शिक्षा से चकित कर दिया था।

  • यीशु मसीह ने अपने जीवन काल में कभी भी किसी से भी चाहे वो काम हो या शब्द हो माफी नहीं मांगी क्योंकि यीशु मसीह ने अपने जीवन काल में कभी कोई गलती नहीं की...कभी कोई गलत शब्द नहीं कहा। यीशु ने पूरा जीवन निर्दोष व पापरहित बिताया...वे पूर्ण रूप से निष्कलंक थे। 

  • यीशु के सांसारिक पिता अर्थात युसुफ पेशे से एक बढई थे इसलिए यीशु भी उनके साथ बढ़ई का काम करते थे। 

  • यीशु के कई भाई और बहन भी थीं,  जिनमें से चार के नाम याकूब, योसेस, सिमोन और यहूदा हैं...बहनों के नाम बाइबल में नहीं दिया गया...(मत्ती 12:46-47, 13:55-56) भाइयों में से याकूब बाद में कलीसिया का अगुवा भी बना। 

  • यीशु मसीह ने 30 वर्ष की आयु में यहुन्ना बप्तिस्मादाता से  यर्दन नदी में बप्तिस्मा लिया..और पानी से बाहर आने के  तुरंत बाद स्वर्ग से परमेश्वर ने कहा यह मेरा प्रिय पुत्र है जिससे मैं अति प्रसन्न हूँ। और यीशु  पर पवित्रात्मा कबूतर के समान उतरा।

  • यीशु बप्तिस्मा के तुरंत बाद 40 दिन और रात निराहार उपवास किया और प्रार्थना किया...जहाँ शैतान ने उनकी परीक्षा ली जिसमें यीशु ने पवित्रशास्त्र के द्वारा ही शैतान को परास्त कर दिया। 

  • यीशु ने उन चालीस दिनों की उपवास और प्रार्थना के बाद लोगों के बीच अपनी सेवा शुरू की। उनकी सेवा काल में ऐसा कोई भी रोगी नहीं हुआ जो यीशु के पास आया हो और चंगाई न पाया हो...फिर वो बीमारी कैसी भी क्यों न हो....

  • यीशु के उपदेश इतने प्रभावशाली होते थे कि उन्हें लोग 'रब्बी' अर्थात गुरुओं का गुरु कहकर पुकारते थे। उनकी शिक्षाएं विश्व प्रसिद्ध हैं जिनमें से कुछ को पहाड़ी उपदेश भी कहा जाता है। जिसने पूरे विश्व में प्रभाव डाला है।

  • यीशु ने अपना पहला चमत्कार काना शहर में एक शादी के दौरान पानी को दाखरस में बदलकर दिखाया। 

  • यीशु मसीह के चमत्कार और अद्भुत काम को देखकर हजारों लोग उनके पीछे आते थे परन्तु केवल 12 चेले कहलाए जिनमें से अधिकाँश चेले मछुआरे थे। 

  • यीशु मसीह ने साड़े तीन वर्ष सेवा की जिसमें उनहोंने सबसे ज्यादा समय प्रार्थना में तथा अपने 12  चेलों को प्रशिक्षित करने में बिताया।

  • यीशु मसीह ने अपने सेवा काल में 3 मुर्दों को जीवित् किया जिसमें एक लाजर कई दिनों से मरा हुआ था।  

  • यीशु पूरी रीति से मनुष्य और पूरी रीति से परमेश्वर थे....अर्थात 100% मनुष्य और 100% परमेश्वर। उन्हें भूख लगती थी...वे रोटी और मछली भी खाते थे उन्हें प्यास लगती थी उनहोंने सामरी स्त्री से पानी माँगा था...उन्हें दुःख होता था अपने मित्र की मृत्यु पर उन्होंने आंसू भी बहाया था...रोया था...और नांव में यीशु सो भी रहे थे। 

  • यीशु मसीह के अद्भुत काम बाइबल में लगभग 37 उद्धरित हैं लेकिन यीशु मसीह के एक शिष्य यूहन्ना ने लिखा है यीशु ने इतने चमत्कार किये है यदि उन सब को लिखे जाते तो वो किताब बनती जो धरती में न समाती।

  • यीशु मसीह को अपने ही एक शिष्य (चेले) ने 30 चांदी के सिक्कों में रोमन सैनिकों के हाथों पकडवा दिया था...जिसका नाम यहूदा इसकरोती था। 

  • यीशु मसीह को रोमन सैनिकों को बिना किसी अपराध के सबसे क्रूर सजा अर्थात क्रूस पर कीलों से ठोंककर लटका दिया जहाँ उनहोंने सुप्रसिद्ध उन सात शब्दों को कहा ... (1)पिता इन्हें क्षमा कर क्योंकि ये नहीं जानते के ये क्या कर रहे हैं... पास में लटके चोर से कहा मैं तुझ से सच कहता हूँ आज ही तू मेरे संग स्वर्गलोक में होगा...पिता मैं तेरे(2) हाथ में आपनी आत्मा सौंपता हूँ...(3)हे नारी ये तेरा पुत्र है...(4)मेरे पिता मेरे पिता तू ने मुझे क्यों छोड़ दिया..(6) मै प्यासा हूँ...(7)सब कुछ समाप्त हुआ। 

  • यीशु मसीह की मृत्यु के समय कई मुर्दे कब्र में से बाहर आ गए थे। 

  • यीशु मसीह को एक गुफा नुमा कब्र पर रखा गया जहाँ से वे तीसरे दिन पुनः जीवित हो उठे और बहुत से लोगों को दिखाई दिए।

  • यीशु मसीह इस वायदे के साथ कि मैं तुम्हारे लिए स्वर्ग में जगह तैयार करने जा रहा हूँ और तुम्हें लेने जल्द ही वापस आऊंगा, वे स्वर्ग में उठा लिए गए।

  • यीशु मसीह के स्वर्गारोहण से पहले उन्होंने अपने अंतिम शब्दों में कहा, देखो जगत के अंत तक मैं सदैव तुम्हारे संग हूँ।  

  • जब बाइबल में उनहोंने एक भी जगह झूठ नहीं बोला और उन सभी भविष्यवाणियों को पूरा भी किया जिसमें उनका जन्म और मृत्यु भी शामिल है तो वो अपने वायदे के अनुसार जल्द ही आने भी  वाले है... 



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