The Secret of Double Blessings (Story)




दुगनी आशीष के ...रहस्य की कहानी

     एक बार स्वर्ग में एक मीटिंग हो रही थी जिसमें सर्वशक्तिमान परमेश्वर अपने सिंहासन में विराजमान थे और दरबार में उनके समक्ष सारे परमेश्वर के पुत्र स्वरूप लाखों स्वर्गदूत अपने अपने सिर नीचे किये हुए आदर में खड़े थे। मुद्दा था की किस रीति से अय्यूब को और आशीष दी जाए...जो परमेश्वर के भक्त था और जो परमेश्वर का भय मानता, बुराई से दूर रहता और खरा था...वह पहले से ही परमेश्वर की आशीषें पाया हुआ था उसे परमेश्वर और आशीष देना चाहता था...परन्तु आशीषों से पहले उसे एक अग्नि जैसी परीक्षा से होकर जाना था....परीक्षा के पश्चात ही आशीषें मिलती हैं।

सभी स्वर्गदूत अपने सिर नीचे किये हुए थे क्योंकि कोई भी स्वर्गदूत एक धर्मी खरे परमेश्वर के भय मानने वाले को कष्ट नहीं देना चाहता था। तभी शैतान दूर से आता हुआ दिखाई दिया...परमेश्वर ने अपनी सामर्थी आवाज में पूछा तू कहाँ से आता है???

      शैतान ने डरते हुए कहा... ‘यहाँ वहां डोलते डालते आ रहा हूँ....

परमेश्वर ने उसे ही इस काम के लिए स्तेमाल करने की मनसा से उसे उकसाते हुए कहा क्या तूने मेरे दास अय्यूब की ओर ध्यान दिया कि उसके समान मेरा भय मानने वाला इस धरती पर और कोई नहीं!!

शैतान जो स्वभाव से ही दोष लगाने वाला है, ने कहा ‘क्या वो तेरा भय बिना लाभ के मानता है??? एक बार उसकी आशीषें उससे छीन ली जाएँ तो वो आपको भी छोड़ देगा..आपकी निंदा करेगा।
    
परमेश्वर ने कहा...ठीक है जा अच्छा जाकर उसे छूकर देख ले...
तब शैतान ने कहा... कैसे छू लूँ...

आपने तो उसके सारे चीजों पर और उसके ऊपर एक सुरक्षा का बाड़ा लगा रखा है...(क्योंकि शैतान पहले ही अय्यूब को छूने की कोशिश कर चुका था परन्तु बाड़े के कारण कुछ बिगाड़ न सका)

परमेश्वर ने हिदायत दी कि तू अय्यूब के सारी चीजें छू सकता है परन्तु उसके प्राण को मत छूना क्योंकि वो मेरा है...
     
      परमेश्वर की अनुमति पाकर शैतान ने अय्यूब के घर में तबाही मचा दी...

एक ही दिन में उसने उसके सारे जानवर मार दिए जो हजारों की गिनती में थे...
   

     
उसके खेत खलियान में आग लगा दी और सब कुछ जला कर ख़ाक कर दिया न केवल खेत पशु नौकर चाकर बल्कि अय्यूब के बच्चों को भी एक घर गिराकर उसके नीचे सारे बच्चों को मार डाला...

इतिहास में ऐसा भयानक नुकसान पहले किसी का नहीं हुआ था...

 एक के बाद एक इतना दर्द अय्यूब के सहने से बाहर था...

लेकिन शैतान तो अय्यूब को शायद मार भी डालना चाहता था। इसलिए उसने अय्यूब के शरीर में एक बीमारी भी दे दी जिसके कारण उसका शरीर फोड़ों फुंसियों और खुजली से भर गया

लेकिन तब भी अय्यूब अपनी आखों में आंसू लिए परमेश्वर को धन्यवाद करता रहा...

 अय्यूब के मित्र दूर दूर से आये और ऐसी हालत देखकर सभी कहने लगे शायद ये तेरे गुनाह के कारण हुआ होगा...

शायद तूने अनजाने में पाप किया होगा...

शायद ये तेरे कर्मों का दंड है.... आदि आदि यह सब सुनकर अय्यूब को और भी दुःख हो रहा था क्योंकि ये शब्द उसे तीर से लग रहे थे....

अब ये मित्र ही शत्रुओं के समान उसे अपने शब्दों से मार रहे थे।

     अय्यूब सोच रहा था जब मेरे दिन अच्छे थे तो ये मित्र लोग मेरी प्रशंसा करते नहीं थकते थे...

आज दिन बुरे हैं तो मेरे मित्र भी मुझे आँख दिखा रहे हैं...

शैतान यह देखकर मारे क्रोध के उसकी पत्नी को उकसाया...इसलिए अय्यूब की पत्नी ने अय्यूब से कहा तू अभी भी परमेश्वर के गुण गा रहा है अरे उसी के कारण तो हम पर यह दुःख आया है तू उसे गाली बक उसकी निंदा कर और मर जा ....

यह शब्द सुनना किसी भी पति के लिए भयानक हो सकता है की पत्नी अपने पति के मरने की कामना करे...

लेकिन अय्यूब अपने धैर्य की चरम सीमा में कहने लगा, ‘परमेश्वर ने दिया था परमेश्वर ने वापस ले लिया उसका नाम धन्य हो ’ उसी की महिमा हो...

यह बात सुनकर परमेश्वर अत्यंत प्रसन्न हुआ....

और परमेश्वर ने अय्यूब से बातें करना प्रारंभ किया...

परमेश्वर ने उसे स्मरण दिलाया किस रीति से अय्यूब जब सुबह उठकर अपने परिवार के लिए अपने लिए बच्चों के लिए प्रार्थना किया करता था तो वह सारी समस्याओं से दूर रहता था... 

प्रार्थनाओं के कारण ही उसके इर्द गिर्द एक सुरक्षा बाड़ा लगा हुआ था...

प्रार्थनाओं के कारण ही लिब्यातान पुराना सांप जो शैतान है बाँध लिया जाता था...

परमेश्वर ने उसे धरा की सबसे बड़ी सामर्थ प्रार्थना के विषय में स्मरण दिलाया....

तब अय्यूब जो अब तक लोगों की फालतू बातों पर मन लगा रहा था उठा और उसने अपने उन्हीं मित्रों के लिए मध्यस्थता की प्रार्थना करने लगा (अय्यूब 42:10)

और स्वर्ग के परमेश्वर ने उसकी प्रार्थना को सुनकर शैतान को दूर कर दिया और उसका सब दुःख दूर हो गया और जितना अय्यूब का नष्ट हो गया था सब कुछ परमेश्वर ने दुगुना उसे दिया...

जो परमेश्वर उसकी परीक्षा के पश्चात पारितोषिक के रूप में देना चाहता था...परमेश्वर ने उसे उस बुजुर्ग अवस्था में भी उसे पहले से भी सुंदर संतानों को आशीष के रूप में दिया...

ये कहानी बताती है हमें हर स्थिति में परमेश्वर को धन्यवाद देना चाहिए...




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