खोई हुई नांव



खोई हुई नांव


      रमेश रोज स्कूल जाते समय नदी के पुल से होकर जाया करता था जाते समय नदी में चलने वाली नावों को देखता और मन में विचार करता काश मेरी भी सुंदर सी नाव होती!! वह छोटी नांव बनाने के लिए लकड़ी एकत्र करता उसमें पाल लगाता धीरे धीरे कुछ न कुछ उस छोटी नावं में जोड़ते जोड़ते कुछ महीने बाद उसने एक सुंदर लगभग एक फिट की नांव बना ही लिया। वह उस नांव को बहुत ही ज्यादा प्यार करता...
बड़े प्यार से सभी को दिखाता, जब कभी उसके स्कूल की छूट्टी होती तो अपनी प्यारी नांव को लेकर नदी के किनारे ले जाता और उसे नदी के घाट के पास ही पानी में तैराता और मन ही मन बड़ा खुश होता...उसे उठा कर कहता, “हे प्यारी सुंदर नांव मैंने तुझे बनाया है...तू किसी भी बड़ी नांव से कम नहीं है, मैं तुझसे बहुत प्यार करता हूँ...”
   लेकिन एक दिन जब रमेश नांव को नदी के किनारे तैरा कर खेल रहा था। तभी एक बड़ी लहर ने उस नांव को नदी के किनारे घाट से थोड़ा दूर गहराई में ले गई....रमेश बड़ा बैचेन होकर आवाज लगा कर लोगों को ऐसे पुकार रहा था जैसे कोई व्यक्ति को बचाने के लिए चिल्ला रहा हो...परन्तु उस दोपहर में वहां सहायता के लिए कोई भी न था जो उसकी नावं को वापस ला सके...नदी में पानी की लहरे इतनी तेज होती गईं कि थोड़ी ही देर में रमेश की नांव उसके आँखों के सामने ही पानी में उसके आँखों से ओझल हो गई...दु:खी रमेश शाम तक नदी के किनारे रोता हुआ खड़ा था। आखिरकार उसे खाली हाथ ही अपने घर आना पड़ा। अब वह जब भी स्कूल जाता उस नदी में जैसे उसकी आँखे चारो ओर अपनी खोई हुई नांव को ही ढूंढती रहती थीं। बहुत समय बीतने पर एक दिन उसके पिता ने जब देखा कि रमेश हमेशा उदास रहता है तो उसके पिता ने उससे कहा, “रमेश चलो आज मेले चलते हैं...रमेश राजी हो गया उसने अपने गल्ले को तोड़कर सारे पैसे एक रुमाल में बांधकर अपने पिता के साथ चल दिया...
वह जैसे ही मेले में पहुंचा तो उसने एक खिलौने की दूकान में सबसे ऊपर रखी हुई एक लकड़ी की नांव देखा!! उसे पहचानने में देर नहीं लगी उसने तुरंत तेजी से चिल्लाया अरे यह तो मेरी नांव है...दुकानदार ने कहा, “यह नांव 200 रूपये की है” रमेश ने कहा नहीं यह नांव तो मैंने बनाई है यह नदी में खो गई थी यह मेरी प्यारी नांव है। दूकानदार ने कहा हो सकता है यह तुम्हारी हो, परन्तु इसे मैंने एक मछुआरे से खरीदा है। अब यह बिकाऊ है और इसका मूल्य 200 रूपये है यदि आपको चाहिए तो आपको दाम देना होगा।
यह सुनकर रमेश को गुस्सा भी आ रहा था परन्तु वह अपनी इस नांव को फिर से खोना भी नहीं चाहता था। इसलिए उसने तुरंत अपना पैसे बंधा हुआ रुमाल निकाला और एक-एक करके गिनने लगा। पैसे पूरे नहीं थे फिर वह दौड़कर अपने पिता के पास गया। पिता ने बहुत दिनों बाद अपने बेटे के चहरे में ख़ुशी देखी थी इसलिए उससे पूछने लगे क्या हुआ बेटा तुझे क्या चाहिए। रमेश ने पूरा हाल कह सुनाया। पिता ने ख़ुशी ख़ुशी बेटे को बाकी पैसे देकर वो नांव खरीद ली।
        रमेश ने जैसे ही अपनी नांव को पाया उसने मारे ख़ुशी से उसको गले लगाते हुए कहने लगा, “हे प्यारी सुंदर नांव मैंने तुझे बनाया है...तू किसी भी बड़ी नांव से कम नहीं है, मैं तुझसे बहुत प्यार करता हूँ...”
यह कहानी हमें प्रभु यीशु की कहानी स्मरण दिलाती है...प्रभु यीशु ने भी मानव जाति को बनाया सारी सृष्टि से सबसे सुंदर परन्तु मानव पाप के भयानक सागर में खो गया...हजारो वर्षों तक परमेश्वर प्रभु यीशु ने जब अनेक नबियों भविष्यवक्ताओं को खोए हुए मानव को लौटा लाने के लिए भेजा...लेकिन जब सब कुछ विफल हो गया तब प्रभु यीशु स्वयं इस धरती पर पाप के भवसागर में पापियों को बचाने के लिए स्वयं उतर आया।  और कोड़े खाकर, अपने प्राणों का बलिदान देकर, पूरा दाम चुकाकर हमें मोल ले लिया। अब जितने उस पर विश्वास करते हैं उन पर दंड की आज्ञा नहीं...जिसे पुत्र ने आजाद किया है वो सचमुच आजाद है...हम आजाद हो गए। आज उस पर विश्वास करने के कारण हम आजाद हैं। आज प्रभु यीशु हमें देखकर कहते हैं, “हे प्रिय सुंदर मानव मैंने तुझे बनाया है...तू किसी भी बड़ी सृष्टि से कम नहीं है, मैं तुझसे बहुत प्यार करता हूँ...”


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