मोम का पुतला






क्योकि यीशु खोए हुओं को ढूंढने और उनका उद्धार करने आया है
(लूका 19:10)

    एक राजा था वह अपने मंत्री से हमेशा कुछ न कुछ पेचीदे, कठिन सवाल करके उसे उलझाने की कोशिश किया करता था। एक दिन राजा ने मंत्री से पूछा मंत्री जी, 'एक बात बताओ...
क्या यीशु मसीह परमेश्वर हैं, राजा हैं और वे सेनाओं का यहोवा हैं? ...तो इसका मतलब उनकी सेनाएं भी होगीं??? 
मंत्री ने हामी भरते हुए कहा, "हाँ महाराज वो परमेश्वर हैं, राजा हैं  निसंदेह उनकी सेना के रूप में उसने पास करोड़ो स्वर्गदूत भी हैं...जो अपने परमेश्वर के लिए सब कुछ कर सकते हैं..."
राजा ने ठहाका मारते हुए कहा यही तो मैं भी कहना चाहता हूँ तो फिर प्रभु यीशु परमेश्वर को स्वयं इस धरती पर क्यों आना पड़ा??...क्या उनको अपने स्वर्गदूत पर भरोषा नहीं है?? उन्होंने अपने स्वर्गदूत को क्यों नहीं भेजा मानव को बचाने के लिए??? वे स्वयं क्यों कूद पड़े इस पापी संसार में???
सारी सभा बड़ी जिज्ञासा से मंत्री के जवाब के इंतजार में उसके मुंह की ओर देख रही थी...मंत्री भी थोड़ा असमंजस में जवाब दिया, "महाराज मैं ऐसा सोचता हूँ कुछ काम मनुष्य को स्वयं करना पड़ता है। राजा ने कहा ऐसा तुम सोचते हो पर मैं नहीं मानता...राजा के सैनिक यदि सक्षम हैं तो वो सब कुछ कर सकते हैं मुझे देखो मुझे कुछ नहीं करना पड़ता कोई भी महत्वपूर्ण काम मैं किसी भी सैनिक यहाँ तक कि तुमसे भी करवा सकता हूँ...
राजा ने पूछा, "मंत्री जी है कोई जवाब...मंत्री ने कहा राजा जी समय आने पर मैं जवाब दूंगा..."

राजा अपने पांच वर्ष के सुंदर राजकुमार से बहुत प्यार करता था। एक दिन राजा को समुद्र पार दूसरे देश में व्यापार के सिलसिले में जाना था। राजा को कुछ ज्यादा दिन लग गए...इतने दिन दूर रहने के कारण राजकुमार अपने पिता राजा जी से मिलने के लिए बड़ा बैचेन था...राजा को जब यह खबर मिली तो उसने मंत्री को यह कहला भेजा मंत्री जी ऐसा इंतजाम करो कि जब मैं अपने राज्य आऊं तो सबसे पहले अपने बेटे राजकुमार का मुंह देखना चाहता हूँ...
मंत्री जी ने सारा इंतजाम किया जिस दिन राजा को आना था उसने राजकुमार को लेकर समुद्र के पास एक बड़े जहाज में सवार करवाया और उसी मार्ग में जहाँ राजा जी आने वाले थे जहाज को अग्रसर किया। 
राजा का जहाज अभी बहुत दूर ही था कि राजा ने देखा उसके देश का जहाज जिसमे उसका पुत्र अर्थात राजकुमार आगे की ओर सवार है और अपना हाथ उठाकर हिला रहा है राजा ने भी अपना हाथ दिखाकर प्रेम दिखाया...तभी राजा ने क्या देखा कि मंत्री ने राजकुमार को उठाकर समुद्र में फ़ेंक दिया....
राजा को अपनी आँखों पर विश्वास ही नहीं हो रहा था...उसे लगा जैसे उसकी सांस ही रुक गई हो...राजा ने आव देखा न ताव और उस जहाज के ऊपर से अपने पुत्र को बचाने के लिए समुद्र में छलांग लगा दी और तैरते तैरते वो अपने पुत्र के पास पहुंचा। और जैसे ही राजा ने अपने राजकुमार को छुआ तो क्या देखता है, कि वो तो एक मोम का पुतला है, जो हुबहू राजकुमार के समान दिख रहा था। 
राजा का क्रोध तो अब जैसे सातवे आसमान में था। वह अपने राज्य आया सभा बुलवाई गई और एक नई तलवार को लिए हुए राजा ने गुस्से में मंत्री से कहा... ऐसा तुमने क्यों किया...
मंत्री ने शांत स्वर में कहा गुस्ताखी माफ महाराज...परन्तु इससे पहले आप कोई फैसला सुनाएं मैं आप से एक प्रश्न पूछना चाहता हूँ...
राजा आपके पास तो दक्ष निपुण सैनिक भी थे जो आपके एक इशारे में अपनी जान देने के लिए तैयार थे...तो आप स्वयं क्यों समुद्र में कूद पड़े...राजा ने कहा, "क्या मतलब है तुम्हारा...अरे वो मेरा पुत्र है उसे बचाने के लिए मुझे स्वयं ही आना पड़ेगा मैं उससे अपनी जान से भी ज्यादा प्यार करता हूँ ...."

मंत्री ने कहा यही है आपके प्रश्न का उत्तर कि, "परमेश्वर यीशु इतने करोड़ो स्वर्गदूत के होते हुए भी क्यों स्वयं इस धरती पर कूद पड़े...
हम मानव उसके पुत्र हैं वो हमने अपनी जान से ज्यादा प्यार करते हैं..."
राजा का क्रोध शांत हो चुका था वो जान गया कि इससे बेहतर तरीके से मंत्री उसे नहीं समझा सकता था...


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4 comments:

  1. Awesome!! Really appreciate !!
    May God continue bless you..

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  2. Kahi na kahi aur kabhi na kabhi mera bhi yeh sawal tha.. aaj mujhe mere swal ka bade hi behtareen aur umda tarike se jawab mil gaya. Thank you Lord..

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  3. धन्यवाद श्रवण भाई आपके उत्साहित शब्दों के लिए प्रभु आपको भी बहुत आशीष दे you are such a blessing for me

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