सुंदर घर में शैतान का कील



क्या तुम नहीं जानते कि तुम परमेश्वर के मन्दिर हो, और परमेश्वर का आत्मा तुम में वास करता है...(1 कुरू. 3:16)
शैतान को अवसर न दो...(इफिसियों 4:27)

किराए के घर में रहने वाला रमेश अपने पत्नी और बच्चे रिंकू से बहुत प्यार करता था। उनके लिए एक अपना नया घर खरीदना चाहता था, क्योंकि किराया दे देकर और मकानमालिक के ताने सुन-सुन कर पक चूका था। कई वर्षों से अपने और परिवार के खर्चों को काट-काटकर उसने कुछ पैसे बचाए थे...उसने अपने घर में हिसाब लगाया सब कुछ जोड़ बटोर कर उसके पास कुल 25 लाख बारह हजार रूपए हो चुके थे...जो उसके दिन रात की खून पसीने की कमाई थी।

उसने एक प्रोपर्टी डीलर के पास जाने का विचार किया...दूसरे दिन प्रोपर्टी डीलर का आफिस  खुलते ही उसने हिम्मत करके  कहा, नमस्कार लाला जी..

अरे आइये आइये भाई साहब बैठिये...डीलर ने स्वागत में कहा...

और क्या लेंगे चाय मंगाऊं...नहीं नहीं लाला जी वो.. म म मैं एक घर खरीदना चाहता हूँ...

डीलर खुश होते हुए "बहुत बढ़िया बात है...अपना घर अपना ही होता है"..मेरे पास कई घर हैं दो 3 बेड रूम का, पार्क के किनारे...5 करोड़ वाली एक कोठी भी बिकाऊ है..और अपार्टमेन्ट भी बन रहा है। आप बताइये आपको कैसा घर चाहिए...

नहीं नहीं इतना मंहगा नहीं...मेरे परिवार में केवल तीन लोग हैं। पति पत्नी और एक बच्चा। मेरे लिए तो आप कोई छोटा घर ही बताइये...

हाँ ठीक है यहाँ पार्क के पास ही एक घर है एक बेडरूम बाथरूम अटेच वो चलेगा। 

रमेश बिलकुल चलेगा जी...वो क्या दाम होगा 

देखिये भाईसाहब आपके लिए वो 50 लाख का लग जाएगा...

50 लाख!!! रमेश ने आश्चर्य से कहा...

अरे आप ऐसे क्यों कह रहे हैं ये ही सबसे कम कीमत वाला घर है जी...इससे कुछ भी कम नहीं हो पाएगा परिवार में बात कर लीजिए कहीं ये भी बिक न जाए। डीलर ने टेबिल में उँगलियाँ बजाते हुए कहा...

रमेश बड़ा उदास चेहरा लेते हुए डीलर के आफिस से बाहर निकला...उसे उसके सपनों का महल बनने से पहले गिरता हुआ सा प्रतीत होने लगा

आफिस के बाहर उसे एक व्यक्ति मिला जो शायद बाहर से डीलर और रमेश की बातें सुन रहा था...

उसने कहा अरे भाई साहब क्या हुआ बड़े उदास से दिख रहे हो...रमेश ने अपनी उदासी छिपाते हुए कहा 'कुछ नहीं' कुछ नहीं...

उस अंजान व्यक्ति ने कहा भाई जी मैं तो कह रहा था कि मेरे पास एक बढिया मकान है दो रूम का..दोनों ओर से खुलता है किचिन बाथरूम और छत भी...यदि आप चाहो तो देख सकते हैं...

रमेश ने सोचा, अच्छा छत भी चलो देखने में कोई बुराई नहीं और उस व्यक्ति के बार बार जोर देने पर उसके पीछे चल दिया....

रमेश को घर बड़ा ही पसंद आया...अरे वाह बहुत बढ़िया बनाया है आपने फिर बेचना क्यों चाहते हैं 
उस अनजान व्यक्ति ने कहा मेरे पास यही पास में एक और घर है सोचता हूँ यह घर बेच दूँ...

रमेश तो कितने का देंगे ये घर...उस व्यक्ति ने कहा...अरे भाई ये घर अपना ही समझिये आप जितना भी देंगे मेरे लिए ठीक होगा....

रमेश: नहीं नहीं आप बताइये यदि मेरे बजट में होगा तो मैं लूंगा 

अनजान व्यक्ति: आपका कितना बजट है?  

रमेश: मैं यही कोई  25 लाख का कोई मकान ढूढ़ रहा हूँ ।
व्यक्ति: अब समझो आपकी खोज पूरी हुई ये मकान आपका हुआ....

रमेश: क्या सचमुच!! आप ये मकान मुझे 25 लाख में दे देंगे??...आप बड़े भले और दरियादिल व्यक्ति लगते हैं...

व्यक्ति: लेकिन???

रमेश: लेकिन, लेकिन क्या आप खुल कर बोलिए!!

व्यक्ति: देखिये मैं इस मकान को बहुत ही प्यार से बनाया है...इसलिए यदि आपको बुरा न लगे तो एक बात कहना चाहता हूँ। कि मेरी एक शर्त है 

रमेश: बोलिए बोलिए भाई साहब...आप क्या चाहते हैं? ...बताइए क्या शर्त है आपकी??

व्यक्ति: 'मैं चाहता हूँ कि वो अंदर वाले रूम में जो कील है वो मेरी रहे...आप पूरा घर ले लीजिये परन्तु वो एक कील मेरी रहेगी मैं यदि कुछ उसमें लटकाऊं तो आप मना तो नहीं करेंगे।

रमेश: अरे क्या बात करते हैं...बस इतनी सी बात आपने मेरे लिए इतना किया है तो क्या मैं आपके लिए इतना छोटा सा काम भी नहीं कर सकता...वो कील आपकी रही आप जब भी चाहो वो कील का इस्तेमाल कर सकते हो...

व्यक्ति: तो डील पक्की रही...

रमेश ने दूसरे दिन उस व्यक्ति के नाम 25 लाख का चेक  काटते हुए डील पक्की की और कागजाद पूरे किये जिसमे वह शर्त भी लिखी हुई थी।

रमेश ने ख़ुशी ख़ुशी कहा अच्छा भाई जी बहुत बहुत धन्यवाद 

रमेश ने उसी सप्ताह एक पार्टी रखी और अपने सारे रिश्तेदारों को बुलाया और उस घर में प्रवेश किया...
सबने घर खरीदने के उपलक्ष्य में रमेश और उसकी पत्नी को बधाई दी सभी खुश थे।

तभी वह व्यक्ति भी आया और कहने लगा नमस्कार भाई जी ...
रमेश: आइये आइये...अपनी पत्नी को आवाज लगाकर कहा 'रमा' भाई साहब बड़े नेक दिल हैं इन्होंने ही हमें यह घर बेचा है...क्या लेंगे भाई साहब चाय या कॉफी...

व्यक्ति: नहीं नहीं कुछ नहीं बस यहाँ से गुजर रहा था तो सोचा आपसे मिलता चलूं...और हाँ वो आपको कील वाली बात तो याद है न...

रमेश: हाँ हाँ मैं कैसे भूल सकता हूँ देखो मैंने उस कील में कुछ भी नहीं टांगा वो आपकी ही है हा हा हा 

व्यक्ति: अच्छा मैं चलता हूँ फिर मिलूँगा....कहकर चल दिया।

रमेश और उसकी पत्नी असमंजस में न जाने यह अजीब सी शर्त क्यों रखी उस व्यक्ति ने...रमेश की रमा ने कहा 'देखो मुझे यह व्यक्ति कुछ अजीब लग रहा है...

रमेश: नहीं नहीं तुम खामखा हर व्यक्ति पर संदेह करती हो!!! 

कुछ दिनों बाद वह व्यक्ति फिर आया और उसके हाथ में मछलियों से भरा हुआ एक थैला था, जो थोड़ा भारी लग रहा था...थैले के इर्द गिर्द मख्खियाँ भी लग रही थीं...और उसने रमेश से कहा नमस्कार भाई जी.....

रमेश...मुस्कुराते हुए नमस्कार भाई साहब और कैसे हैं...

व्यक्ति: ये थैला थोड़ा भारी था सोचा उस कील में लटका दूँ बाद में ले लूंगा...

रमेश: कुछ हिचकिचाते हुए...ठीक है आपका घर है लटका दीजिए...

व्यक्ति: ने उस थैले को उसी कील में लटका दिया...और नमस्कार करके चल दिया।

उसके जाने के बाद रमेश की पत्नी और बच्चे रिंकू ने रमेश को बहुत खरी खोटी सुनाई। ये क्या है हमारे घर में बदबू ही बदबू आ रहा है...रमेश उन्हें समझाया अरे कोई बात नहीं एक दो दिन में वो ले जाएगा। वो कोई बुरा ब्यक्ति नहीं हैं। उसने 50 लाख से ज्यादा का घर हमें केवल 25 लाख में दे दिया...आदि अनेकों बातों से उसने अपने परिवार को शांत करवा दिया...।
लेकिन जैसे जैसे दिन बीतने लगे...वो मछली के सड़ने से पूरे घर में बदबू इतनी ज्यादा फैलने लगी यहाँ तक कि बच्चा और पत्नी बीमार होने लगे...पत्नी कहती तुम फेक क्यों नहीं देते इस थैले को...रमेश को अब अपनी गलती का एहसास हो चला था...वो समझ गया था कि उससे घर की डील करते समय भारी गलती हो चुकी थी। वो चाह के भी उस कील में से उस थैले को अलग नहीं कर सकता था। वो बंध चूका था । वह सोच ही रहा था कि घर के बाहर से कुछ लोगों की जोर जोर से चिल्लाने की आवाज आई.....मिस्टर रमेश बाहर आओ...हमें तुमसे कुछ बातें करना हैं...

रमेश ने जैसे ही दरवाजा खोला तो क्या देखता है कि पूरा का पूरा मोहल्ला इकट्टा होकर चिल्ला रहा है....सभी गुस्से से लाल है...सभी कहने लगे अरे क्या रखा है घर में कोई जानवर मर गया है क्या? पूरा मोहल्ला बदबू दे रहा है...
इस मोहल्ले में तो अब कोई सब्जी वाला भी नहीं आता....
हम इस मोहल्ले में नहीं रह पा रहे हैं ये और इसका परिवार न जाने कैसे रह रहा है..???
अरे रमेश जी फेंकते क्यों नहीं उस गंदगी को जो बदबू दे रही है....हम सबको मार डालना चाहते हो क्या...या तो तुम इसे साफ करो या तुम साफ हो जाओ इस मोहल्ले से जीने दो हमें नहीं तो हम पुलिस के पास जाएँगे और आपके खिलाफ कार्यवाही करंगे....
रमेश दोनों हाथों को जोड़े हुए...एक मुजरिम की तरह खड़ा रो रहा था....वो सबसे माफी मांग रहा था....बस मुझे शाम तक की मोहलत और दीजिए...

रमेश उसी समय उस व्यक्ति के पास जाकर...जोर जोर से गुस्से में चिल्लाने लगा...कहा तुमने मुझे बर्बाद कर दिया मेरे खून पसीने की कमाई लूट ली...मेरे पैसे वापस करो मुझे नहीं चाहिए वो घर...या तो मेरे पैसे वापस करो या उस कील और थैले को वहां से अलग करो...

व्यक्ति: हंस रहा था...और उसने कहा तुमने स्वयं यह मंजूर किया था...अब तो न पैसे वापस होंगे और न वो कील वहां से अलग होगी हा हा हा

और रमेश को बिना पैसे ही उस घर को खाली करना पड़ा....

मित्रों इस कहानी से सीखते हैं कि शैतान भी हमारे जीवन रूपी घर में एक कील या एक छोटा सा स्थान चाहता है जैसे कोई बुरी लत या आदत के द्वारा...जब हम प्रभु यीशु में विश्वास करते हैं तो एक नई सृष्टि बन जाते हैं और यह शरीर परमेश्वर का मन्दिर बन जाता है हम इसे जीवता भावता परमेश्वर को अर्पित करते हैं...यदि शैतान का एक कील भी हमारे अंदर हम लगाने की अनुमति दें तो एक न एक दिन वह रमेश के घर की तरह हमारा पूरा जीवन नाश कर सकता है....क्योंकि उसका काम ही है चोरी करना घात करना और नाश करना...इसलिए अपने जीवन में शैतान को अवसर मत दो ...


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