डब्ल्यू लिविंग्स्टन लार्नेड का अपने बेटे को पत्र



डब्ल्यू लिविंग्स्टन लार्नेड का अपने बेटे को ऐसा लाजवाब पत्र लिखा जिसकी लाखों प्रतियाँ छप चुकी हैं। यहाँ उसकी हिंदी प्रति प्रस्तुत है।

  • सुनो बेटे: मैं तुमसे यह कह रहा हूँ, जब तुम गहरी नींद में सोए हो, तुम्हारा छोटा-सा हाथ गाल के नीचे है और बालों की सुनहरी लटें तुम्हारे भीगे माथे पर चिपकी हैं। मैं अकेला चुपके से तुम्हारे कमरे में चला आया हूँ। कुछ मिनट पहले, जब मैं लाइब्रेरी में बैठा अख़बार पढ़ रहा था, पछतावे की लहर मेरे भीतर दौड़ गई। अपराध बोध से भरा हुआ, मैं तुम्हारे बिस्तर के पास आया। 
  • बेटे, मैं इन चीजों के बारे में सोच रहा था: मैं तुमसे नाराज था। स्कूल के लिए तैयार होते वक्त मैंने तुम्हें डाँटा, क्योंकि तुमने अपने चहरे को सिर्फ तौलिये भिगोकर पोंछ लिया था। मैं अपने जूते साफ न करने के लिए तुम पर गुस्सा हुआ। जब तुमने कुछ चीजें फर्श पर फ़ेंक दी, तो मैं तुम पर गुस्से से चिल्लाया। 
  • नाश्ते के समय भी मैंने तुम्हारी गलतियाँ निकालीं। तुमने चीजें गिराई। तुम अपना खाना बिना ठीक से चबाए निगल गए। तुमने मेज पर कोहनियाँ रखी। तुमने ब्रेड पर बहुत ज्यादा मक्खन लगाया। और जब तुम खेलने लगे और मैं ट्रेन पकड़ने के लिए बढ़ गया, तो तुम मुड़े और हाथ हिलाकर कहा, "गुड बाई डैड!" और मैंने मुंह बनाकर कहा, "अपने कंधे आगे मत निकालो!"
  • फिर शाम को बही सब दुबारा शुरु हो गया। जब मैं सड़क पर आया, तो मैंने तुम्हें दूर से देखा। तुम घुटनों के बल झुके कंचे खेल रहे थे। तुम्हारी जूराबों में छेद थे। मैंने तुम्हारे दोस्तों के सामने तुम्हें बेज्जत किया और तुम्हें पकड़कर घर ले आया। तुमसे कहा, 'जुराबें मंहगी थीं और अगर तुम्हें उनको खरीदना पड़ता, तो तुम्हें पता चलता। 
  • क्या तुम्हें याद है, बाद में जब मैं लाइब्रेरी में पढ़ रहा था, तो तुम कैसे वहां आए थे ? तुम डरे हुए थे और तुम्हारी आँखों में चोट खाने का भाव था। जब मैंने अख़बार से नजरें उठाई, तो तुम दरवाजे पर ही ठिठक गए। बीच में व्यवधान डालने से अधीर होकर मैंने कड़ाई से पूछा, "क्या चाहिए तुम्हें?"  
  • तुमने कुछ नहीं कहा, बस एकदम से दौड़ पड़े और अपनी बाँहें मेरे गले में डाल दी और मुझे चूमा! तुम्हारी नन्हीं बांहें प्यार से मुझसे लिपट गईं, जो परमेश्वर ने तुम्हारे दिल में उमड़ा दिया था और जिसे मेरी उपेक्षा भी कमजोर नहीं कर पाईं थीं। और फिर तुम सीढियों पर थप-थप करते हुए चले गए थे ।
  • बेटे, इसके कुछ ही देर बाद मेरे हाथों से अख़बार सरककर गिर गया और एक भयानक डर मुझ पर छा गया। मुझे कैसी आदत पड़ गई है? गलतियाँ निकालने की आदत, झिडकियां देने की आदत। एक लड़का होने के लिए यह तुम्हें मेरा ईनाम था। ऐसा नहीं था कि मैं तम्हें प्यार नहीं करता। ऐसा इसलिए था, क्योंकि मैं तुमसे बहुत ज्यादा उम्मीद करता था। मैं अपनी उम्र के पैमाने से तुम्हें नाप रहा था। 
  • और तुम्हारे चरित्र में इतना कुछ ऐसा था, जो अच्छा,बढिया और सच्चा था। तुम्हारा छोटा सा दिल दूर तक फैली पहाड़ियों पर उगने वाली सुबह जितना बड़ा था। आज तुमने जिस तरह एकदम से दौड़कर मुझे गुडनाईट किस दी, उससे साफ जाहिर हो गया। मैं अँधेरे में तुम्हारे बिस्तर के पास आया हूँ, और वहां घुटनों के बल बैठा हूँ। मैं शर्मिंदा हूँ। 
  • यह एक कमजोर-सा पश्चाताप था। मैं जानता हूँ, अगर मैं तुम्हारे जागने पर तुम्हें यह सब बताऊँ, तो तू इन बातों को नहीं समझोगे। लेकिन कल मैं असल डैडी बनूँगा। मैं तुम्हारे साथ खेलूंगा , और जब तुम्हें चोट लगेगी तो मुझे भी दर्द होगा, और जब तुम हंसोगे तो मैं भी हंसूंगा। जब मेरी जुबान पर खीझ भरे शब्द आएंगे, तो मैं अपनी जुबान काट लूंगा। मैं बार बार इसे दुहराता रहूँगा, "वह तो बस एक छोटा बच्चा है ...एक छोटा बच्चा।" 
  • मुझे डर है कि मैंने एक बड़े आदमी के तौर पर तुम्हारी तस्वीर मन में बैठा ली थी। लेकिन, बेटे अब मैं तुम्हें देखता हूँ, अपने पलंग पर गुड़ी मुड़ी सोते हुए, तो मैं देख सकता हूँ कि तुम अब भी छोटे से बच्चे हो। अभी कल ही तो तुम अपनी मम्मी की बांहों में थे, तुम्हारा सर उसके कंधों पर था। मैंने तुमसे बहुत ज्यादा मांग लिया, बहुत ज्यादा।


W. Livingston Larnedcondensed as in "Readers Digest"Listen, son: I am saying this as you lie asleep, one littlepaw crumpled under your cheek and the blond curls stickilywet on your damp forehead. I have stolen into your room alone.Just a few minutes ago, as I sat reading my paper in thelibrary, a stifling wave of remorse swept over me. GuiltilyI came to your bedside.There are the things I was thinking, son: I had been crossto you. I scolded you as you were dressing for school becauseyou gave your face merely a dab with a towel. I took you totask for not cleaning your shoes. I called out angrily whenyou threw some of your things on the floor.At breakfast I found fault, too. You spilled things. Yougulped down your food. You put your elbows on the table. Youspread butter too thick on your bread. And as you started offto play and I made for my train, you turned and waved a handand called, "Goodbye, Daddy!" and I frowned, and said inreply, "Hold your shoulders back!"Then it began all over again in the late afternoon. As I cameup the road I spied you, down on your knees, playing marbles.There were holes in your stockings. I humiliated you beforeyour boyfriends by marching you ahead of me to the house.Stockings were expensive-and if you had to buy them you wouldbe more careful! Imagine that, son, from a father!Do you remember, later, when I was reading in the library, howyou came in timidly, with a sort of hurt look in your eyes?When I glanced up over my paper, impatient at the interruption, you hesitated at the door. 

"What is it you want?" I snapped.You said nothing, but ran across in one tempestuous plunge,and threw your arms around my neck and kissed me, and yoursmall arms tightended with an affection that God had setblooming in your heart and which even neglect could not wither.And then you were gone, pattering up the stairs.Well, son, it was shortly afterwards that my paper slippedfrom my hands and a terrible sickening fear came over me. 

Whathas habit been doing to me? The habit of finding fault, ofreprimanding-this was my reward to you for being a boy. Itwas not that I did not love you; it was that I expected toomuch of youth. I was measuring you by the yardstick of my own years.And there was so much that was good and fine and true in yourcharacter. The little heart of you was as big as the dawnitself over the wide hills. This was shown by your spontaneousimpulse to rush in and kiss me good night. Nothing else matterstonight, son. I have come to your bedside in the darkness, andI have knelt there, ashamed!

It is feeble atonement; I know you would not understand thesethings if I told them to you during your waking hours. Buttomorrow I will be a real daddy! 

I will chum with you, and sufferwhen you suffer, and laugh when you laugh. I will bite mytongue when impatient words come. I will keep saying as if itwere a ritual: "He is nothing but a boy-a little boy!"I am afraid I have visualized you as a man. Yet as I see younow, son, crumpled and weary in your cot, I see that you arestill a baby. Yesterday you were in your mother's arms, yourhead on her shoulder. I have asked too much, too much.

  


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