वचन को सुन कर उस पर चलना


वचन को सुन कर उस पर चलना

वचन पर चलनेवाले बनो, और केवल सुननेवाले ही नहीं जो अपने आप को धोखा देते हैं 
(याकूब 1:22)


एक बार एक कलीसिया का सदस्य परमेश्वर के दास को बड़े ही गुस्से में कहता है, ‘पास्टर साहब कई साल से मैं चर्च में आकर उपदेशों को सुनता हूँ, ध्यान से सुनता हूँ परन्तु कुछ भी नहीं हो रहा है, न मेरे जीवन में न ही मेरी परिस्थिति में कुछ भी बदलाव नहीं है। परमेस्वर के दास ने बड़े ही शालीनता से जवाब दिया आप कहाँ रहते हो?
उस व्यक्ति ने जवाब दिया, ‘यहाँ से दो किलोमीटर दूर आनन्द विहार में’। पास्टर ने कहा कि कैसे वहां से आते जाते हो? उसने जवाब दिया कभी बस में कभी ऑटो में कभी मोटरसाइकल से...पास्टर ने फिर से पूछा तुम्हें कितना समय लगता है अपने घर पहुंचने में उसने कहा कभी आधा घंटा कभी बीस मिनिट। पास्टर ने प्रश्न किया क्या तुम अभी इसी समय बैठे बैठे अपने घर आनन्द विहार पहुँच सकते हो? उसने आश्चर्य से जवाब दिया ऐसे कैसे हो सकता है, यह तो असम्भव है...उसके लिए मुझे उठाना होगा बस स्टैंड जाना होगा और बस में बैठकर तभी घर पहुच सकता हूँ। पास्टर ने जवाब दिया आपने बिलकुल सही कहा...जिस प्रकार आप बैठे बैठे घर नहीं जा सकते अपनी मंजिल तक पहुंचने के लिए कुछ करना होगा...ठीक उसी प्रकार जो अच्छे संदेश होते हैं यदि जीवन में कुछ बदलाव लाना है परिवर्तन लाना है आशीष पाना है तो उन अच्छे उपदेशों को अपने जीवन में लागू करना होगा उसके अनुसार आचरण करना होगा। ज्ञान कोई भी क्यों न हो वह तभी सार्थक एवं प्रभावशाली होता है जब उसे व्यावहारिक रूप से जीवन में उतारा जाए। उस विश्वासी को अपनी गलती समझ आ चुकी थी उसने कहा पास्टर साहब मैं पूरी तरह से समझ गया मेरी गलती कहाँ हो रही थी। केवल अच्छे वचनों को सुनने मात्र से कुछ नहीं होगा मुझे उन वचनों पर चलना भी होगा... 



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