मिट्टी की पुकार




मिट्टी की पुकार

अब परमेश्वर जो सारे अनुग्रह का दाता है, जिसने तुम्हें मसीह में अपनी अनंत महिमा के लिए बुलाया, तुम्हें थोड़ी देर तक दुःख उठाने के बाद आप ही तुम्हें सिद्ध और स्थिर और बलवंत करेगा । 
(1 पतरस 5:10) 

     नर्मदा नदी के किनारे की चिकनी मिट्टी हमेशा देखती रहती थी कि लोग अपने सिर में मटका लाते हैं और उसे खूब अंदर बाहर धोकर उसमे पीने का पानी ले जाते हैं। यह मिट्टी एक दिन यही सोच सोच कर बड़ी दुखी होने लगी कि ये मटका भी तो मिट्टी है और मैं भी मिट्टी हूँ फिर मेरे साथ इतना अन्याय क्यूँ? मुझे पैरों तले रौंदा जाता है, और उसे सिर पर रखकर लाया ले जाया जाता है। और यह सोचकर वह मिट्टी रोने लगी और कहने लगी परमेश्वर मुझे भी मटका बनना है , मुझे भी सम्मान चाहिये...मैं जिल्लत भरी जिन्दगी नहीं जीना चाहती। एक दिन वहां एक कुम्हार चिकनी मिट्टी की तलाश में अपने गधे को भी लेकर आया । और उसने देखा अरे वाह ये तो बढिया चिकनी मिट्टी है। और उसे उठाकर अपने गधे पर रख लिया । यह मिट्टी तो इतनी खुश हुई कि जैसे परमेश्वर ने उसकी दुआ सुन ली । उसे कुम्हार ने अपने घर ले जाकर बाहर आंगन में पटक दिया। बहुत  दिनों तक मिट्टी यूं ही पड़ी रही और मिट्टी सूखकर पत्थर जैसी सख्त हो चुकी थी। अब मिट्टी फिर रोने कुड़कुड़ाने लगी ये भी कोई जिन्दगी है मैं तो मटका बनने आई थी पत्थर नहीं इससे तो अच्छी मैं वहीँ थी। अभी सोच ही रही थी कि कुम्हार एक हथोड़ा लाकर उस मिट्टी को तोड़ने लगा। अब तो वह चिल्ला उठी, ‘कैसा निर्दयी है यह कुम्हार? फिर उस कुम्हार ने उसे एक छन्ने में डालकर छान दिया । अब वो रेत सी बन चुकी थी...अब उसे अपने आप पर गुस्सा आने लगा पहले तो कम से कम मुझमें नमी तो थी। मिट्टी और कुछ कह पाती इससे पहले ही कुम्हार ने उस पर पानी डाल कर उस पर नाचने लगा। मिट्टी को लगा यह कुम्हार नहीं पक्का कसाई है । अब कुम्हार उसे आटे सा सानकर एक चक्की में रख दिया और उसने उसे इतना जोर से घुमा दिया की मिट्टी को तो जैसे चक्कर ही आ गए। कुम्हार के उन सने हुए हाथो का जब अन्दर और बाहर दबाव पड़ा तो एक बेडौल मिट्टी में सुन्दर आकार आने लगा...यह उसकी समझ के परे था वो ... 
     अब एक मटका बन चुकी थी... परन्तु यह क्या वह अपने को निहार हीं नहीं पायी थी कि उसे आग की परीक्षा से होकर गुजरना पड़ा और वो चिल्ला उठी मैं तो मर गयी जल गयी...
      जब वह बाहर आई तो अब वो पका हुआ मटका थी जो सैकड़ों लोंगों की प्यास बुझाकर उन्हें ठंडक दे सकती थी। बहुत बार हम सफल तो होना चाहते है पर सफलता की प्रक्रिया में हिम्मत हार जाते हैं।

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