Motivational true Short story (गरीबी में स्वाभिमान)



गरीबी में स्वाभिमान
जो निर्धन खराई से चलता है, वह उस मूर्ख से उत्तम है जो टेढ़ी बातें बोलता है 
(नीतिवचन 19:1)
   नाव गंगा के इस पार खड़ी है। यात्रियों से लगभग भर चुकी है। रामनगर के लिए खुलने वाली है, बस एक दो सवारी और चाहिए, वहीं बगल में एक युवक खड़ा है। नाविक उसे पहचनता है, और बोलता है, ‘आ जाओ, खड़े क्यों हो, क्या रामनगर नहीं जाना?
नवयुवक ने कहा, ‘जाना है, लेकिन आज में तुम्हारी नाव से नहीं जा सकता’। क्यों भाई रोज तो इसी नाव से आते जाते हो आज क्या बात हो गई? ‘आज मेरे पास उतराई देने के लिए पैसे नहीं हैं। तुम जाओ। अरे! यह भी ज्कोई बात हुई। आज नहीं, तो कल दे देना। नवयुवक ने सोचा बड़ी मुश्किल से तो माँ मेरी पढाई का खर्च उठाती है। कल भी यदि पैसे का प्रबंध नहीं हुआ, तो कहाँ से दूंगा? उसने नाविक से कहा, ‘तुम ले जाओ नौका, मैं नहीं जाने वाला। वह अपनी किताब कापियां एक हाथ में ऊपर उठा लेता है और छपाक नदी में कूद जाता है। नाविक देखता ही रह जाता है।  उसके मुख से निकला, ‘अजीब मनमौजी लड़का है। छपछप करते नवयुवक गंगा नदी पार कर जाता है। रामनगर के तट पर अपनी किताबें रखकर कपड़े निचोड़ता है। घर पहुंचने पर माँ राजदुलारी इस हालत में अपने बेटे को देख चिंतित हो उठीं। अरे! तुम्हारे कपड़े तो भीगे हैं। जल्दी उतारो। यह कैसे हुआ? नवयुवक ने सारी बात बतलाते हुए कहा, ‘तुम्ही बोलो माँ अपनी मजदूरी मल्लाह को क्यों बतलाता? फिर वह बेचारा तो खुद गरीब आदमी है। उसकी नाव पर बिना उतराई दिए बैठना कहाँ तक उचित था? गंगा पार करके आया हूँ। माँ ने सुनकर पुत्र को सीने से लगाते हुए कहा, ‘बेटा, तू जरूर एक दिन बहुत बड़ा आदमी बनेगा’। 
     वह नवयुवक कोई और नहीं लाल बहादुर शास्त्री थे, जो देश के प्रधानमन्त्री बने और 18 महीनों में ही राष्ट्र को प्रगति की राह दिखाई।

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