लालच का मटका



लालच का मटका


सब लालचियों की चाल ऐसी ही होती है, उनका प्राण लालच ही के कारण नाश हो जाता है। 
(नीतिवचन 1:19)

        रामनगर नामक गाँव में एक बन्दर था। जिसने पूरे गाँव में हाहाकार मचा के रखा था। कभी किसी के घर में से रोटी उठा के ले जाता तो कभी लोगों के मटके फोड़ देता। कभी कभी तो फलों के बगान में घुस कर कच्चे फलों को तोड़ता और नुकशान पहुंचाता था। गाँव के लगभग सभी लोग उससे तंग आ चुके थे। कई बार उसे मारने की योजना बनाई गयी परन्तु वो बन्दर इतना चालाक था, कि हर बार बच निकलता।       
         गाँव के आधे लोग तो कहते थे उसे मार डालते हैं। लेकिन गाँव के पंचायत ने निर्णय लिया कि जो भी हो...बन्दर को मारेंगे नहीं वरन उसे जीवित ही पकड़ कर नदी के पार जंगल में छोड़ देंगे। परन्तु सवाल वहीं का वहीँ था कि बंदर को पकड़ेंगे कैसे। तब गाँव के एक बुजुर्ग व्यक्ति ने एक उपाय सोचा जिससे बन्दर भी पकड़ा जाए और बन्दर को कोई नुक्सान भी न हो। और उसने पत्थर का एक बड़ा और भारी मटका बनवाया जिसका मुंह बहुत छोटा था और उस मटके को आधे से ज्यादा मूंगफली से भर दिया। मूंगफली की भीनी भीनी खुशबू से बंदर खिंचा चला आया और जल्दी से उसने अपना हाथ उस मटके में डाल दिया।
            अपने बड़े पंजे से उसने अपनी मुट्ठी में ढेर सारी मूंगफली पकड़ ली। लेकिन जैसे ही बन्दर ने अपनी मुट्ठी निकालनी चाही। तो मटके के मुंह छोटा होंने के कारण वह उससे नहीं निकाल पाया। बन्दर खूब जोर लगाने लगा, उसके हाथ में दर्द हो रहा था वो चिल्ला भी रहा था परन्तु उसका हाथ उस मटके से बाहर नहीं आ रहा था। मटका इतना भारी था कि वो इसे लेकर भाग भी नहीं सकता था। ऐसे समय में उसके पास दो चुनाव थे एक या तो वह मूंगफली का लालच छोड़ दे और मुट्टी खोलकर, हाथ निकालकर आजाद होकर भाग जाए। या फिर मूंगफली मिलने की आस में मुट्ठी बिना खोले निकालने की कोशिश करता रहे...आप क्या सोचते है उसने क्या किया होगा? ...
     बिलकुल आपने सही सोचा उसके लालच ने ही उसे पकड़वा दिया और उसे अपने प्राणों से हाथ धोने पड़े।





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