आलसी मेंढक और परिश्रमी मेंढक




आलसी मेंढक और परिश्रमी मेंढक 


परिश्रमी की लालसा उसके लिये परिश्रम करती है, उसकी भूख उसको उभारती रहती है.(नीतिवचन 16:26)




      एक बार की बात है, दो मेंढक गाँव की सड़क पर जा रहे थे एक भयानक तूफान आया और वे घबरा गयेहवा इतनी तेज चल रही थी कि वे अपने को सम्भाल नहीं पाए और बिछड़ गयेदुविधा में पहला मेंढक दूध की पतीली में गिर गयाउसने अपने चारों ओर देखा, गुस्से में जीवन और इसकी अनिश्चितताओं को कोसने लगावह रोते हुए समस्या के बारे में शिकायत करने लगा और कहने लगा की जीवन कितना बुरा है वह रोता रहा, कोसता रहा, उसने अपनी सारी शक्ति को समस्या पर  केन्द्रित कर लिया उसने जल्दी ही हार मान ली और वह मर गया 
        दूसरा मेंढक भी दूध की एक पतीली में ही गिरा, परन्तु उसका नजरिया अलग था, उसका द्रृष्टिकोण भिन्न था, वह सकारात्मक था.  उसे दूध में गिरना अच्छा नहीं लगा था उसे वे कठोर झटके पसंद नहीं थे, जो जीवन ने उसे दिये थे पर उसने अपनी शक्ति को समस्या के बजाय समाधान की ओर लगाया वह उछलता रहा और हाथ-पैर चलाता रहाउसने हार नहीं मानी उसने महसूस किया की यह महत्वपूर्ण नहीं है कि आपके साथ क्या होता है, असली महत्व की बात यह है कि आप इसके बारे में क्या करते हैं. इसलिए वह हाथ-पैर चलाता रहा, लगातार चलाता रहा वह तब तक हाथ-पैर चलाता रहा, जब तक कि दूध मलाई में नहीं बदल गया, और मलाई मक्खन में न बदल गई,और जब मक्खन दूध में तैरने लगा तो वो मेंढक मक्खन के ऊपर से कूदकर जीवित बाहर निकल आया। 
      हमारा नजरिया ही सब कुछ है कि हम समस्या की ओर अपना ध्यान लगाते हैं या समाधान की ओर 





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