आत्मिक हिंदी लघु ऑडियो कहानियां व बाइबिल मनन

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ऑडियो बुक :- आत्मिक जागृति में देरी क्यों / Why Revival Tarries

आत्मिक जागृति में देरी क्यों / Why Revival Tarries 

मोनिका की आवाज में 


ऑडियो सुनने के लिए धन्यवाद परमेश्वर आपको बहुत आशीष दे
यदि आप इस सेवा को आगे बढाने में अर्थात और भी मसीही पुस्तक को आडियो बनाने में तथा सुसमाचार सुनाने में हमारी मदद करना चाहते हैं तो आप इस नम्बर 9718484154 में फोन पे के द्वारा सहायता कर सकते हैं...धन्यवाद ...परमेश्वर आपको बहुत आशीष दे....

आत्मिक हिंदी लघु ऑडियो  कहानियां व बाइबिल मनन




घमंड. परमेश्वर के साथ चलने की सबसे बड़ी बाधा

मित्रों प्रभु यीशु में आप सभी को मेरा प्यार भरा नमस्कार,
हम कुछ सप्ताह से सीख रहे हैं कि कैसे हम परमेश्वर के साथ-साथ चल सकते हैं...पवित्रशास्त्र में हम अनेकों ऐसे उदाहरणों को पाते हैं जो परमेश्वर के साथ चले हैं...ऐसे गवाहों का बादल हमें घेरे हुए है...बहुत से प्रभु के लोग हुए जिन्होंने अपनी दौड़ दौड़ी...बहुतों की शुरुआत तो बहुत बढ़िया थी परन्तु मार्ग में वे बहुत सी बाधाओं के कारण अपनी दौड़ पूरी नहीं कर पाए....या यूँ कहें कि कुछ बाधाओं ने उन्हें परमेश्वर के साथ साथ चलने से रोक दिया...उन बाधाओं में से सबसे बड़ी बाधा जो परमेश्वर के साथ चलने से रोकती है वो बाधा है घंमड...सब मन के घमंडियों से परमेश्वर घृणा करता है...
     
      ऐसा ही एक उदाहरण हम पवित्रशास्त्र के 2 इतिहास की पुस्तक के 26 अध्याय में पाते हैं जहाँ उज्जियाह नामक राजा था जो मात्र 16 साल की उम्र में ही राजा बन गया और पांचवी आयत में हम पाते हैं वह परमेश्वर की खोज में लगा रहता था...जब तक वह परमेश्वर की खोज करने में लगा रहा तब तक परमेश्वर ने उसे सफलता दी (उसे भाग्यवान) बनाए रखा...यहाँ हम एक सबक को सीखते हैं कि परमेश्वर स्वयं चाहते हैं कि खोई उन्हें खोजे...उसके मार्ग के खोजी बने रहे....उसके साथ चले...उसकी आज्ञाओं का पालन करें....उसने तो वायदा ही किया है कि, तू पहले उसके धर्म और राज्य की खोज कर और देख बाकी सारी वस्तुएं या सफलता हमारे पीछे हो लेंगी....परमेश्वर अपने साथ साथ चलने वाले को सफल और भाग्यशाली भी बनाता...परमेश्वर के संग चलना अपने आप में एक सफलता और सौभाग्य है.....

लेकिन (2 इतिहास 26:16) में हम देखते हैं कि जब वह सामर्थी हो गया, तब उसका मन फूल उठा...अर्थात वह घमंड से भर गया...वह अहंकारी हो गया....और वह यहाँ तक बिगड़ गया कि उसने परमेश्वर के विरुद्ध विश्वासघात किया...परमेश्वर किसी गरीब भक्त के साथ साथ चल सकता है परन्तु किसी घमंडी धनी...या सामर्थी विश्वासघाती के साथ नहीं चल सकता। राजा उज्जियाह इतना घमंडी हो गया कि परमेश्वर के दासों के मना करने पर भी वह परमेश्वर के मंदिर में धूप जलाने के लिए घुस गया। इस पर परमेश्वर का क्रोध उस पर इस रीति से भड़का कि वह कोढ़ी हो गया...और परमेश्वर के मन्दिर से अर्थात प्रभु की उपस्थिति से उसे भागना पड़ा...

परमेश्वर उज्जियाह राजा के घमंड से इस कदर क्रोधित था कि जब तक वह मरा नहीं तब तक परमेश्वर की महिमा मन्दिर में प्रगट नहीं हुई...(यशायाह 6:1) में लिखा है जिस वर्ष उज्जियाह राजा मरा, मैंने प्रभु को बहुत ही ऊंचे सिंहासन पर विराजमान देखा.... 

मित्रों बहुत बार हमारे जीवन में भी किसी न किसी रूप में घमंड रूपी उज्जियाह राजा जीवित रहता है, जो किसी धन के रूप में या शरीर के रूप में या आदत के रूप में,  या ऊंचे पद के रूप में हो सकता है...जब तक हमारे जीवन में भी वो घमंड रूपी उज्जियाह राजा मरेगा नहीं हमारे जीवन में भी प्रभु ऊंचे सिंहासन में विराजमान नहीं हो सकता...प्रथम स्थान नहीं पा सकता...जिस दिन घमंड पूर्ण रूप से मर जाता है...परमेश्वर की पूर्ण महिमा हमारे जीवन में प्रगट हो जाति है...
https://youtu.be/2CKpNB51hfA

परमेश्वर के साथ चलना,दण्ड से छुटकारा है

..."अब जो मसीह यीशु में हैं, उन पर दण्ड की आज्ञा नहीं..क्योंकि वे शरीर के अनुसार नहीं बल्कि आत्मा के अनुसार चलते है" (रोमियों 8:1)

     क्या ही सुंदर प्रतिज्ञा है अब जो मसीह में हैं उन पर दण्ड की आज्ञा नहीं...हम स्वभाव से ही पापी थे...सबने पाप किया और परमेश्वर की महिमा से रहित थे...हम सबके पापों की मजदूरी तो मृत्यु होनी थी...परन्तु परमेश्वर के अपार प्रेम से उसने हमसे प्रेम किया...हमें चुन लिया...और अपने एकलौते पुत्र के लहू से हमारे सारे पापों को धोकर हमें शुद्ध किया....इसलिए अब जो कोई मसीह यीशु में हैं वो एक नई सृष्टि हैं पुरानी बातें बीत गई...देखो सब कुछ नया हो गया है...

    अब हम पर दण्ड की आज्ञा नहीं...परमेश्वर के साथ-साथ चलने वालों के लिए खुशखबरी है कि उन पर दण्ड की आज्ञा नहीं...दुनिया के शाप...दुनिया की ताकतें...काले जादू - टोने की शैतानी शक्तियाँ...उन पर कोई असर नहीं कर सकती। यहाँ तक कि हम नरक की आग से भी बच सकते हैं....

हम बाइबल में पाते हैं, जब प्रभु यीशु को क्रूस पर कीलों से लटकाया गया...उस समय प्रभु के इर्द गिर्द दो चोर डाकुओं को भी मृत्यु दण्ड के लिए लटकाया गया...जिन्होंने जीवन भर केवल चोरी की थी हत्या की थी डाका डाला था...उनमें से एक चोर तो प्रभु यीशु ठठ्टा कर रहा था...निंदा करके कह रहा था यदि तू प्रभु है तो अपने आप को बचा ले और हमें भी बचा...लेकिन प्रभु के उस छोटे अद्भुत उपदेश के कारण दूसरा चोर ने पूर्ण समर्पण के साथ प्रभु से विनती की...प्रभु जब तेरा राज्य आए तो मेरी भी सुधि लेना...जीवन भर पाप करने और अधर्म में जीवन जीने के बावजूद उसकी एक दिल से की गई प्रार्थना और प्रभु में आने के कारण उसे प्रभु ने अनुग्रह के कारण एक महान प्रतिज्ञा दी...अब तेरे ऊपर दण्ड की आज्ञा नहीं...मैं तुझसे सच कहता हूँ ...आज ही तू मेरे साथ स्वर्गलोक में होगा...

      फर्क नहीं पड़ता की हमारे प्रभु के साथ चलने की उम्र या समय सीमा की लम्बाई कितनी रही है परन्तु मायने इस बात से है की उसमें समर्पण कितना है...इस चोर ने जो यीशु मसीह के साथ विश्वास में चलने की समय सीमा कुछ पल ही रही है और उस चोर के पीढ़ी दर पीढ़ी के पाप और शाप एक पल में ही टूट गया...और उसे स्वर्ग प्राप्त हुआ...आज प्रभु का वचन हमें भी उसके साथ आत्मा के अनुसार चलने का आह्वान करता है...एक निमन्त्रण एक बुलाहट देता है....

परमेश्वर के साथ चलना एक लक्ष्य प्रदान करता है

परमेश्वर के साथ चलना, एक लक्ष्य प्रदान करता है 

हे भाइयों, ...मैं केवल यह एक काम करता हूँ, कि जो बातें पीछे रह गई हैं उनको भूल कर, आगे की बातों की ओर बढ़ता हुआ, निशाने की ओर दौड़ा चला जाता हूँ, ताकि वह इनाम पाऊं जिसके लिए परमेश्वर ने मुझे मसीह यीशु में ऊपर बुलाया है'। (फिलिप्पियों 3:13-14)

परमेश्वर के साथ साथ चलना हमारे जीवन में एक लक्ष्य प्रदान करता है।  किसी ने कहा है, बिना लक्ष्य के जीवन, बिना पता लिखे लिफाफे के समान है, जो कभी कहीं पहुँच नहीं सकता । 

प्रभु यीशु मसीह के पास एक बड़ा लक्ष्य था... सारी मानव जाति को पाप से बचाने का लक्ष्य...उन्होंने कहा मैं खोए हों को ढूंढने और उनका उद्धार करने आया हूँ...पाप रूपी अन्धकार भरी दुनिया के लिए मैं जगत की ज्योति हूँ...उनके पास एक स्पष्ट लक्ष्य था...उनके अंदर अपने पिता परमेश्वर की इच्छा को पूरा करने की आग थी...उन्होने कहा मेरे पिता के घर की धुन मुझे खा जाएगी....मेरा भोजन मेरे भेजने वाले की इच्छा को पूरा करना है...और जो कोई भी उनसे मिलता...बातें करता वो भी उस ज्वलंत शील इच्छा से उस लक्ष्य से अछूता नहीं रहता था...

प्रभु यीशु का महान चेला पतरस भी जब हारा हुआ निराश होकर झील के किनारे प्रभु यीशु से मिला तो प्रभु ने उसके जीवन में एक चमत्कार किया और जिस स्थान में वो हार गया था, उसी स्थान में उसे नांव भर कर मछली देकर उसे विजयी किया...और यह कह कर कि मेरे पीछे हो ले मै तुझे मनुष्यों को पकड़ने वाला मछुआरा बनाऊंगा...पतरस की हैसियत से बढ़कर एक लक्ष्य दिया....

लुका रचित सुसमाचार 10:17-20 में एक घटना का वर्णन है। प्रभु यीशु मसीह ने 70 चेलों को जो उसके साथ साथ लगभग साड़े तीन वर्षों तक चले थे... नियुक्त किया और उनके लिए एक योजना बनाई कि दो-दो की जोड़ी में उन्हें उन स्थानों में जाना है जहाँ प्रभु यीशु स्वयं जाना चाहते थे। और उन्हें कौन सा सामान साथ नहीं ले जाना है और जाकर क्या-क्या करना है,  इस विषय में  स्पष्ट आदेश दिए। 9 वीं  आयत में लिखा है कि यीशु ने उनसे कहा वहां के बीमारों को चंगा करो और उनसे कहो कि परमेश्वर का राज्य तुम्हारे निकट आ पहुंचा है। उसके बाद उसने कहा कि जो तुम्हारी सुनता है, वह मेरी सुनता है। जो तुम्हें तुच्छ जानता है, वह मुझे तुच्छ जानता है। और जो मुझे तुच्छ जानता है वह मेरे भेजने वाले को तुच्छ जानता है। आज तक जिनके पास कोई लक्ष्य नहीं था उन्हें स्पष्ट और महान लक्ष्य मिल चूका था

  17 वीं आयत में लिखा है इस सबका परिणाम यह हुआ कि वे सत्तर आनन्द से वापस आकर कहने लगे कि हे प्रभु तेरे नाम से दुष्टआत्मा भी हमने निकालीं। वे हमारे वश में हैं। तब प्रभु यीशु ने उनसे कहा कि मैं शैतान को बिजली के जैसे स्वर्ग से गिरा देख रहा था। 

आज यदि हम उस पर विश्वास करते हैं तो प्रभु यीशु जो स्वयं जगत की ज्योति है हमें अपने संग बुला कर महान आदेश देते हुए कहता है...तुम जगत की ज्योंति हो...तुम धरा के नमक भी हो...जाओ और जाकर सारे जगत के लोगों को चेला बनाओ और उन्हें पिता, पुत्र और पवित्रात्मा के नाम पर बप्तिस्मा दो। और उन्हें वे सारी बातें मानना सिखाओ जो मैंने तुम्हें सिखाईं हैं...और देखो जगत के अंत तक मैं तुम्हारे साथ हूँ...हमारे पास एक बड़ा लक्ष्य है...आइये उसके साथ साथ चलते हूए इसे पूरा करें। 

परमेश्वर के साथ चलना, सिद्धता प्रदान करता है

परमेश्वर के साथ चलना, सिद्धता प्रदान करता है


जब अब्राम 99 वर्ष का हो गया, तब यहोवा ने उसको दर्शन देकर कहा, "मैं सर्वशक्तिमान  ईश्वर  हूँ; मेरी उपस्थिति में चल और सिद्ध होता जा"  (उत्पत्ति 17:1-2)


परमेश्वर चाहता है की उस पर विश्वास करने वाला उसके साथ चलने वाला हर व्यक्ति उसके पुत्र प्रभु यीशु के जैसे सिद्ध हो जाए, परमेश्वर सिद्ध है... हमारे धार्मिकता के काम हमें सिद्ध नहीं कर सकते, लेकिन मात्र परमेश्वर के साथ चलना ही हमें सिद्धता प्रदान कर सकता है। परमेश्वर चाहते हैं कि  हम सिद्ध  होकर उससे बातें करें वो कहता है तू मुझसे मांग मुझसे बातें कर प्रार्थना कर और मैं तेरी सुनकर तुझे जवाब दूंगा, और वो गूढ़ भरी रहस्मयी बातें बताऊंगा जो तू अभी नहीं जानता।


अब्राहम परमेश्वर के साथ बुजुर्ग अवस्था में पूरी विश्वासयोग्यता के साथ चलने लगा और वेदी बना बनाकर परमेश्वर की उपासना करता था। और इस कारण एक दिन स्वयं परमेश्वर उसके घर आते हैं और अब्राहम अनजाने में परमेश्वर की पहुनाई करता है उन्हें भोजन परोसता है प्रभु उसके घर भोजन करते हैं और उसकी बूढी पत्नी सारा को आशीष देते हैं कि  अगले वर्ष तू एक बेटे को प्राप्त करेगी। यह सब अब्राहम और उसकी पत्नी के लिए बड़े ही आश्चर्य की बातें थीं जैसे कोई स्वप्न हो...  और तब थोड़ी देर में ही परमेश्वर अपने इस धरती में आने का कारण, वो रहस्य अब्राहम को बतातें हैं... कि  अब्राहम मैं इस धरती से करोड़ो करोड़ो किलोमीटर दूर स्वर्ग से एक काम के लिये आया हूँ...  मैं उस शहर जहाँ तेरे रिस्तेदार रहते हैं उस शहर सदोम और गमोरा का पाप इतना बढ़ गया है कि  मैं उस शहर को आग और गंधक से नाश करना चाहता हूँ... सुन तू मेरे साथ साथ चलता है मैं तुझ से कैसे कुछ छिपा सकता हूँ....


अब्राहम चाहता तो अपने भतीजे लूत से बदला लेने के लिए यह एक अच्छा मौका सोच सकता था.... लेकिन अब अब्राहम परमेश्वर के साथ साथ चलते चलते सिद्धता को प्राप्त कर रहा था.... वह तुरंत घुटने में आ कर अपने परमेश्वर से विनती करने लगता है.. वह उस शहर के लिए मध्यस्था  करता है और प्रभु से कहता है यदि वहां कुछ धर्मी होंगे प्रार्थना करने वाले होंगे तो क्या आप उन्हें भी नाश कर देंगे। यहाँ हम परमेश्वर की अद्भुत   

 नम्रता देखते हैं, अब्राहम परमेश्वर से गिड़गिड़ाता है और पचास से कम करते करते दस धर्मी तक में आ जाता है। अब्राहम दस में आकर रुक जाता है लेकिन परमेश्वर उससे गुस्सा या क्रोधित नहीं हुआ (उत्पत्ति19:33) में लिखा है अब्राहम अपने घर लौट गया... ऐसा लगता है परमेश्वर अभी भी चाहता था कि  शायद अब्राहम और थोड़ा कम कारवाता  या और थोड़ी प्रार्थना करता तो शायद वह शहर या देश नाश नहीं होता। परमेश्वर हमें अपने साथ चलने की बुलाहट देता है ताकि हम सिद्ध होकर अपने देश को प्रार्थना करके बचा सकें आइये आज हम अपने देश के लिए प्रभु की सिद्धता में होकर प्रार्थना करें।

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